Tuesday, August 23, 2011
Saturday, August 20, 2011
भ्रस्टाचार क्या है ?
आखिर क्या है भ्रस्टाचार, क्यों हो रहा है ये हो हल्ला, क्या हम जारी रख पाएंगे अन्ना जी के द्वारा श्हुर किये गए इस आन्दोलन को, या कुछ दिनों बाद हम फिर से भूल जायेंगे इस आन्दोलन को ? ये सारे सवाल है जो हमारे जेहन में कौध रहे है क्या करें हम भारत वासी जो है, हमें गर्व है भारत वासी होने का लेकिन क्या करें भ्रस्टाचार तो यहाँ के लोगों के जेहन में है सरकार भ्रष्ट, सरकारी मुलाजिम भ्रष्ट और तो और जनता भी भ्रष्ट. क्या लगता है सिर्फ कुछ दिन तक सडको पर उतर कर सरकार के खिलाफ नारेबाजी करके हम भ्रस्टाचार मिटा सकते है. नहीं.. सिर्फ यही करने से हमारे देश से भ्रस्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता इसे जड़ से खत्म करने का सबसे अचूक तरीका है जैसे हम आज जागरूक हुए है वैसे हमें हमेसा जागरूक होना पड़ेगा, अपने हक़ के लिए लड़ना पड़ेगा, इस देश के हर नागरिक का क्या अधिकार है ये जानना होगा, जो क्रांति अन्ना जी ने शुरू की है उसे सदा आगे बढ़ाना होगा, अगर ७४ साल की उम्र में अन्ना जी सरकार को घुटनों के बल ला सकते है तो इस देश का हर नागरिक अगर आगे आये तो क्या कुछ नहीं हो सकता है.
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Tuesday, August 9, 2011
कहानी गरीबी की
कोई न कोई घटना ,दुर्घटना रा यूँ कह लीजिये संजोग तो सब के साथ होता रहता है, दुनिया का ऐसा कौन सा इन्सान होगा जिसके जीवन में कोई ऐसी बात न हुई हो जिसने उसके मन पर कुछ असर न डाला हो, न भी डाला हो तो मै औरों की बात कैसे कर सकता हु लेकिन मेरे मन पर तो ऐसी एक घटना ने गहरा प्रभाव छोड़ा है और वो घटना मुझे कभी भूलती नहीं है.
मैंने बड़े करीब से देखा है गरीबी को क्यों की मै एक छोटे से ग्रामीण परिवार का रहने वाला हु और गावों में आज भी गरीबी का मंजर देखने को मिलजाता है, मैंने उस गरीबी को देखा है जब जड़े के सर्द मौसम में भी गरीब परिवार के बच्चों के पास तन ढके के लिए गर्म कपडे नहीं होते थे और खाने के लिए भोजन भी नहीं होता था , आज कल तो बड़े बड़े दावे किये जा रहे है कि भारत समृद्ध हो रहा है यहाँ गरीबी कम हो रही है, कहाँ कम हो रही है गरीबी और कहा भारत समृद्ध हो रहा है, क्या देश के गिने चुने लोगों के आमीर हो जाने से देश में गरीबी ख़त्म हो जाएगी या देश का विकास हो जायेगा ? कभी नहीं. गरीबी तो आज भी है हमारे देश में और आज भी बहुत सारे लोग है जिन्हें खाना भी नसीब नहीं होता है , आज भी बच्चे स्कूल जाने कि उम्र में अपना बचपना भुला कर ढाबों पर, होटलों में, कारखानों पर और अमीरों के घरों में, नालियों में कुडों के ढेर पर से प्लास्तिच्क इकठ्ठा करते दिख जाते है और हम कहते है कि गरीबी कम हो रही है
मै आप को अपने जीवन कि एक घटना सुनाता हूँ , मै उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के छोटे से गाँव कटघरा का रहने वाला हु , आज मेरी उम्र लगभग २५ वर्ष है और मुझे याद है जब मेरी उम्र लगभग १३-१४ वर्ष कि रही होगी . मैं अपने गाँव में कुछो दोस्तों के साथ खेल रहा था कभी मैंने देखा कि मेरे गाँव में एक बीमार और बूढी औरत जो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी लोगों के घरों के पास जा कर कुछ खाने को मांगने लगी, देखने में वह औरत इतनी कुरूप और गन्दी लग रही थी कि लोग उसे कुछ देने कि बजाय अपने घर से भगाने लगे मुझे यह देख बड़ा आश्चर्य हुआ कि दुनिया में कितने निर्दयी लोग भी होते है एक तो लोग उसे कुछ दे नहीं रहे थे और ऊपर से झिडकियां भी सुना रहे थे. मुझे उस दिन पता चला कि गरीबी इन्सान से क्या कुछ नहीं करा देती है . फ्री भी वह बूढी लचर औरत हर दरवाजे गयी लेकिन हर जगह उसे वही झिडकियां ही मिली . यह देख मेरा मन दादा द्रवित हुआ और मै वहां से दौड़े दौड़े अपने घर आया अपनी माता जी से साडी बात बताई, मेरी माता जी ने कहा बेटे उसे यहाँ बुला लाओ वैसे मुझे पता था कि घर में खाना समाप्त हो चूका था क्यों कि दोपहर बाद का समय था और घर के सारे सदस्य खाना खा चुके थे, फिर भी मैं दौड़ते हुआ वापस गया लेकिन तब तक वो औरत वहा से कहीं जा चुकी थी मैंने आस पास लोगों से पूछा तो किसी ने कुछ बताया नहीं मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ कि मैंने उस लचर औरत कि कोई मदद नहीं कि मैंने फिर भी उसे ढूढना सुरु किया, लगभग २०-२५ मिनट कि तलाश के बाद वो और मुझे गाँव के ही एक जगह मिल गयी मैंने उससे कहा " आजी हमरे घरे चला तोहके हमार मम्मी बोलावलस ह " ये बात सुन कर वो औरत जिसे देख कर ही लग जा रहा था कि उसे कई दिन से भूखी है बड़ी खुश हुई और मेरे साथ मेरे घर आयी, मेरी माता जी ने उसके लिए शरबत बनाया और उसे भुजा जिसे गाँव में "दाना" भी कहता है खाने को दिया और उसे तन ढकने के लिए एक साड़ी भी दी और बदले में उस औरत बूढी औरत ने हमें दुनिया कि अमूल्य चीज जिसे हम आशीर्वाद कहते है दिया जिसके लिए हम मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे जाते हैं वो हमें देदी स्वरुप बूढी दादी से वही मिल गया. इस कम से मुझे जो आत्मीय संतोष मिला वो मै बयां नहीं कर पा रहा हूँ. अपनी सारी बात उस औरत ने कह सुनाई और बताया कि एक मुसहर जाती कि है, गरीबी ने उसे इस कदर परेसान कर रखा था कि उसे पेट भरने के लिए रोटी और तन ढकने के लिए कपडा भी नहीं था, वह औरत लालची नहीं बल्कि स्वाभिमानी थी उसने अपने से कभी खाने के सिवाय और कुछ नहीं माँगा, सालों तक को महीने में एक बार मेरे घर जरू आती और वो अमूल्य आशीर्वाद हमें दे जाती, हमारे परिवार को भी जैसे उसके आशीर्वाद कि आदत सी हो गयी थी. कुछ सालों बाद उस बूढी दादी का आना बंद हो गया और मै भी तब तक घर से बहार पढाई के लिए चला गया एक बार मुझे उसकी याद आयी मैंने माता जी से पूछ तो पता चला कि वो तो अब इस दुनिया में नहीं रही सुन कर बड़ा दुःख हुआ पर मन को संतोष भी था कि चलो मैंने कभी उनकी मदद तो कि. वैसे मुझे लगता है कि उनका आशीर्वाद आज भी हमारे साथ है और हमारे उन्नति में सहायक है .
अभिषेक सिंह
Sunday, July 24, 2011
पंथनिरपेक्ष ढांचे पर प्रहार
अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के अपने एजेंडे पर प्रतिबद्ध संप्रग सरकार एक ऐसा कानून बनाने जा रही है जो सांप्रदायिक सौहार्द को नष्ट-भ्रष्ट कर सकता है, संविधान की संघीय विशेषताओं को कमजोर कर सकता है और केंद्र सरकार को राज्यों के शासन में दखल देने के नए बहाने उपलब्ध करा सकता है। प्रस्तावित विधेयक को सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम बिल नाम दिया गया है और इसका जो उद्देश्य बताया जा रहा है वह सांप्रदायिक संघर्ष की घटनाओं पर अंकुश लगाना, लेकिन इसका निर्माण इस पूर्वाग्रह के साथ किया गया है कि सभी स्थितियों में धार्मिक बहुसंख्यक ही अल्पसंख्यक समुदाय पर जुल्म करता है। लिहाजा बहुसंख्यक समाज के सदस्य दोषी हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग पीडि़त। चूंकि यही धारणा इस कानून का आधार है इसलिए यह स्वाभाविक है कि प्रस्तावित कानून 35 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में से 28 में बहुसंख्यक हिंदुओं को सांप्रदायिक हिंसा के लिए जिम्मेदार मानता है और मुस्लिम, ईसाई तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को पीडि़त के रूप में देखता है। इस कानून का मसौदा उस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने तैयार किया है जो छद्म सेक्युलरिस्टों, हिंदू विरोधियों और नेहरू-गांधी परिवार के समर्थकों का एक समूह है और कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी जिसकी अध्यक्ष हैं। इस परिषद को केंद्र की एक ऐसी सरकार से बराबर महत्व मिल रहा है, जिसका नेतृत्व पहली बार अल्पसंख्यक समाज के एक सदस्य द्वारा किया जा रहा है। इस प्रस्तावित कानून के प्रावधान ऐसे हैं कि यह सांप्रदायिक सौहार्द को प्रोत्साहन देना तो दूर रहा, हिंदुओं के बीच पंथनिरपेक्षता की प्रतिबद्धता को ही कमजोर कर सकता है। विधेयक के मसौदे के अनुसार यदि किसी समूह की सदस्यता के कारण जानबूझकर किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसा कृत्य किया जाए जो राष्ट्र के सेक्युलर ताने-बाने को नष्ट करने वाला हो..। सबसे बड़ी शरारत शब्द समूह की परिभाषा में की गई है। इसमें कहा गया है कि समूह का तात्पर्य भारत के किसी राज्य में धार्मिक अथवा भाषाई अल्पसंख्यक या अनुसूचित जाति अथवा जनजाति से है। इसका अर्थ है कि हिंदू, जो आज ज्यादातर राज्यों में बहुसंख्यक हैं, इस कानून के तहत समूह के दायरे में नहीं आएंगे। लिहाजा उन्हें इस कानून के तहत संरक्षण नहीं मिल सकेगा, भले ही वे मुस्लिम अथवा ईसाई सांप्रदायिकता, घृणा या हिंसा के शिकार हों। अनेक विश्लेषकों ने कहा भी है कि इसका अर्थ है कि यदि 2002 में यह कानून लागू होता तो जिन 59 हिंदुओं को गुजरात के गोधरा स्टेशन में साबरमती स्टेशन में जलाकर मार दिया गया उनकी हत्या के संदर्भ में एफआइआर दर्ज नहीं कराई जा सकती थी, क्योंकि इस कानून के तहत गुजरात में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन मुस्लिम गोधरा बाद के दंगों के लिए इस कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल कर सकते थे। इसका सीधा अर्थ है कि सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होने वाले हिंदुओं को दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में देखा जाएगा और यह काफी कुछ पाकिस्तान जैसे इस्लामिक राज्य में लागू हिंदू विरोधी कानूनों की तरह है। प्रस्तावित कानून के मसौदे के अनुसार एक पीडि़त की व्याख्या अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य के रूप में की गई है, जिसे सांप्रदायिक हिंसा की घटना में शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक क्षति पहुंची हो या उसकी संपत्ति को नुकसान हुआ हो। इसके दायरे में उसके संबंधी, कानूनी अभिभावक और उत्तराधिकारी भी शामिल हैं। इस व्याख्या के आधार पर देश के किसी हिस्से में कोई मुस्लिम या ईसाई का यदि किसी सामान्य मुद्दे पर अपने हिंदू पड़ोसी से विवाद होगा तो वह इस कानून का इस्तेमाल कर अपने पड़ोसी पर यह आरोप लगा सकता है कि उसने उसे मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचाया है। यदि वह किसी कारण ऐसा न करे तो उसके संबंधी ऐसा कर सकते हैं। इस पूरी कवायद का जो बुनियादी मकसद नजर आता है वह है हिंदुओं को निशाना बनाना। विधेयक कहता है कि इसे पूरे भारत में लागू किया जाएगा, लेकिन जब देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर की बात आती है तो इसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य की सहमति से इसे वहां लागू कर सकती है। यद्यपि इस विधेयक को इस तरह अंतिम रूप दिया गया है कि हिंदू समुदाय इसके विचित्र प्रावधानों की मार झेले, लेकिन मुस्लिम, ईसाई और सिखों को भी परेशानी झेलनी पड़ सकती है, क्योंकि बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के निर्धारण के लिए राज्य ही इकाई है। 2001 के जनगणना आंकड़ों के मुताबिक सिख पंजाब में 59.9 प्रतिशत हैं, जबकि हिंदुओं की आबादी 36.9 प्रतिशत है। यदि यह कानून लागू हो जाता है तो बहुसंख्यक सिख समाज को हिंदुओं की शिकायत पर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसी तरह ईसाई तीन राज्यों-नागालैंड (90 प्रतिशत), मिजोरम (87 प्रतिशत) और मेघालय (70.30 प्रतिशत) में बहुसंख्यक हैं। यदि इन राज्यों में हिंदुओं ने इस कानून का मनमाना इस्तेमाल शुरू कर दिया तो ईसाई समाज को मुसीबतें उठानी पड़ सकती हैं। लिहाजा मुस्लिम, ईसाई और सिख समुदाय को कांग्रेस पार्टी के इस दावे पर कदापि भरोसा नहीं करना चाहिए कि यह विधेयक पंथनिरपेक्षता को मजबूत करेगा, क्योंकि यह विधेयक सांप्रदायिक हिंसा और घृणा के सभी दोषियों को बराबरी पर नहीं देखता। प्रत्येक राज्य में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के निर्धारण में एक अन्य विसंगति भी है। मणिपुर में 46 प्रतिशत हिंदू हैं और अरुणाचल प्रदेश में 34.60 प्रतिशत। चूंकि इन राज्यों में किसी धार्मिक समूह के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है लिहाजा किसे पीडि़त माना जाएगा और किसे दोषी? इसके अतिरिक्त यदि अनुसूचित जाति और जनजाति को हिंदू समुदाय से अलग कर दिया जाए तो इन राज्यों में हिंदू आबादी का प्रतिशत क्या होगा? केरल का मामला भी है, जहां 56.20 प्रतिशत हिंदू हैं। अगर इससे 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति और जनजाति को अलग कर दिया जाए तो हिंदुओं का प्रतिशत क्या होगा? यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि जो कानून बनाया जा रहा है वह दरअसल सांप्रदायिक भी है और एक समुदाय यानी हिंदुओं को निशाना बनाने वाला भी। अगर इस विधेयक के सूत्रधार अपने मंसूबे में सफल रहे तो भारत की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाएगी। ऐसा विधेयक वह व्यक्ति नहीं बना सकता जो लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्ष भारत से प्यार करता है। हमें इसकी जांच करनी चाहिए कि विधेयक का मूल मसौदा कहां से आया है?
यह लेख दैनिक जागरण के सम्पादकीय से लिया गया है .
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Wednesday, June 29, 2011
कांग्रेस के मूल स्वभाव और चरित्र को समझे बिना वर्तमान राजनीति के पतन का विश्लेषण संभव नहीं।
कांग्रेस के मूल स्वभाव और चरित्र को समझे बिना वर्तमान राजनीति के पतन का विश्लेषण संभव नहीं। विडंबना यह है कि कांग्रेस के सत्ता केंद्रित अहंकारी स्वभाव का प्रसार भारत की राजनीति में घर कर चुका है। सत्ता के लिए किसी भी सीमा तक जाना तथा राजनीति में वोट लाभ के लिए अनुपयोगी जनकल्याण को छोड़ देना इसका स्वभाव बन गया है। सत्ता की आतुरता और संघर्ष से घबराहट के कारण ही कांग्रेस ने 1947 में पाकिस्तान का प्रस्ताव स्वीकार करके भारत का विभाजन कराया। पचास के दशक में चीन के हाथ तिब्बत खोया और 1.25 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि चीन तथा पाकिस्तान के कब्जे में जाने दी। लेडी एडविना माउंटबेटन के प्रभाव में नेहरू कश्मीर का मामला सरदार पटेल की सहमति के बिना राष्ट्रसंघ में ले गए जिस कारण धारा 370 का ऐसा संवैधानिक विधान लागू करवाया जो बाद में अलगाववाद तथा आतंकवाद के पोषण का सबसे बड़ा कारण बन गया। कांग्रेस की इसी सत्ताभोगी मानसिकता के कारण 1962 में चीन का हमला हुआ। 1965 में हम जीतकर भी हारे तो 1971 में इंदिरा गांधी को मिले अभूतपूर्व सर्वदलीय प्रशंसा और समर्थन के बावजूद शिमला समझौते में हम कश्मीर का मसला निर्णायक तौर पर हल नहीं कर सके। हालांकि उस समय पाकिस्तान की गर्दन हमारे हाथों में थी। इसी कारण उस समय वरिष्ठ कवि सोम ठाकुर ने लिखा था- इतिहास लिखा था खून से जो स्याही से काट दिया हमने। चुनावी लाभ के लिए दंगे, बेवजह पुलिसिया कार्रवाई, ब्ल्यू स्टार तथा 1984 के सिख विरोधी दंगों आदि से उसका सत्ताविलासी चरित्र और इतिहास साबित होता है। 1947 के बाद से आज तक सबसे ज्यादा हिंदू-मुस्लिम दंगे केवल कांग्रेस शासित राज्यों में हुए। संप्रग-1 व 2 के दौरान कांग्रेस ने सच्चर समिति से लेकर हज यात्रियों के लिए जरूरी पासपोर्ट तक में पुलिस जांच की जरूरत खत्म करके सामाजिक खाई पैदा करने का प्रयास किया है जिसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। आम जनता प्राय: इतिहास को जल्दी भुला देती है। कांग्रेस कितनी निर्मम और संवेदनहीन हो सकती है इसका सबसे भयानक उदाहरण यदि 1975 में लागू आपातकाल है तो ताजा उदाहरण सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा निषेध विधेयक है। यह विधेयक कांग्रेस के विकृत एवं हिंदू विरोधी अराष्ट्रीय चरित्र का सबसे निकृष्ट उदाहरण है। इस विधेयक द्वारा न केवल हिंदुओं को आक्रामक और अपराधी वर्ग में ला खड़ा करने, बल्कि हिंदू-मुस्लिमों के बीच शत्रुता पैदा कर हर गली-कस्बे में दंगे करवाने की साजिश है। यदि यह औरंगजेबी फरमान कानून की शक्ल लेता है तो किसी भी हिंदू पर कोई भी मुस्लिम नफरत फैलाने, हमला करने, साजिश करने अथवा नफरत फैलाने के लिए आर्थिक मदद देने या शत्रुता का भाव फैलाने के नाम पर मुकदमा दर्ज करवा सकेगा और उस बेचारे हिंदू को इस कानून के तहत कभी शिकायतकर्ता मुसलमान की पहचान तक का हक नहीं होगा। इसमें शिकायतकर्ता के नाम और पते की जानकारी उस व्यक्ति को नहीं दी जाएगी जिसके खिलाफ शिकायत दर्ज की जा रही है। इसके अलावा शिकायतकर्ता मुसलमान अपने घर बैठे शिकायत दर्ज करवा सकेगा। इसी प्रकार यौन शोषण व यौन अपराध के मामले भी केवल और केवल मुस्लिम (जिसे विधेयक में अल्पसंख्यक वर्ग के अंतर्गत समूह नाम से परिभाषित किया गया है) हिंदू के विरुद्ध दर्ज करवा सकेगा और ये सभी मामले अनुसूचित जाति और जनजाति पर किए जाने वाले अपराधों के साथ समानांतर चलाए जाएंगे। इसका मतलब है कि संबंधित हिंदू व्यक्ति को कभी यह नहीं बताया जाएगा कि उसके खिलाफ शिकायत किसने दर्ज कराई है? इसके अलावा उसे एक ही तथाकथित अपराध के लिए दो बार दो अलग-अलग कानूनों के तहत दंडित किया जाएगा। यही नहीं, यह विधेयक पुलिस और सैनिक अफसरों के विरुद्ध उसी तरह बर्ताव करता है जिस तरह से कश्मीरी आतंकवादी और आइएसआइ उनके खिलाफ रुख अपनाते हैं। विधेयक में समूह यानी मुस्लिम के विरुद्ध किसी भी हमले या दंगे के समय यदि पुलिस, अर्द्धसैनिक बल अथवा सेना तुरंत और प्रभावी ढंग से स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करती तो उस बल के नियंत्रणकर्ता अथवा प्रमुख के विरुद्ध आपराधिक धाराओं में मुकदमे चलाए जाएंगे। कुल मिलाकर हर स्थिति में पुलिस या अर्द्धसैनिक बल के अफसरों को कठघरे में खड़ा होना होगा, क्योंकि स्थिति पर नियंत्रण जैसी परिस्थिति किसी भी ढंग से परिभाषित की जा सकती है। इस विधेयक की धाराएं किसी भी सभ्य, समान अधिकार संपन्न एवं भेदभावरहित गणतंत्र के लिए ईदी अमीन और सऊदी अरब के शाहों की तरह ही अन्य आस्थाओं के लोगों के प्रति नफरत एवं आक्रामकता का दर्शन कराती हैं। प्रसिद्ध न्यायविद जेएस वर्मा और न्यायमूर्ति बीएल श्रीकृष्ण ने भी इस विधेयक को एकतरफा झुकाव वाला, केंद्र एवं राज्यों में अफसरशाही निर्मित करने वाला और केंद्र-राज्य संबंधों में नकारात्मक असर डालने वाला बताया है। जरा देखिए, इस विधेयक को बनाने वालों ने सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए जिस सात सदस्यीय समिति के गठन की सिफारिश की है, उसमें चार सदस्य मजहबी अल्पसंख्यक होंगे। विधेयक मानकर चलता है कि यदि समिति में अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों का बहुमत नहीं होगा तो समिति न्याय नहीं कर सकेगी। अपेक्षा है कि ये सात सदस्य किसी भी सांप्रदायिक हिंसा को रोकेंगे, जांच पर नजर रखेंगे, आपराधिक मुकदमों, पेशियों, राहत कार्यो तथा पुनर्वास को अपनी देखरेख में चलाएंगे। आखिर ये सात सदस्य होंगे या फरिश्ते अथवा फिर आपातकाल के दारोगा?
Abhishek Singh
Ghazipur
Friday, April 15, 2011
पत्र जो हमारे दिल के करीब होते थे
नमस्कार पाठकों
मुझे पत्र लिखने का तो कम ही मौका मिला है परन्तु पत्र पढने का कई बार मिला है. जिसे हम गावों में चिट्ठी के नाम से जानते थे, वो चिट्ठी का इंतजार वो चिट्टी के साथ आत्मीय लगाव और चिट्ठी में लिखी और पूछी गयी सारी बातें जिस में घर के साथ साथ गाय, भैस खेती बाड़ी और पुरे गाँव संग संग रिश्तेदारी की भी ख़बरें ऐसा लगता था जैसे पत्र लिखने वाला सामने ही खड़ा हो और हाल पूछ रहा हो. चिट्ठी की पहली लाइन ही ऐसे शुरू होती थी जैसे मिठाश की बौछार और इस बौछार में पूरे परिवार को भिगाने की की गयी वो शानदार कोशिश, छोटों को आशीर्वाद और बड़ों को प्यार ऐसे शब्द जैसे दिल को छू जाते थे. पोस्टमैन चाचा को देखते ही मन में बरबस ही ख्याल आ जाता की हो सकता है मेरे भी घर की चिट्ठी हो और पूछ बैठते चाचा चिट्ठी है क्या ? अगर होती तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता. फिर शुरू होता चिट्ठी पढने का शिलशिला और वो अनवरत कई दिनों तक चलता रहता . मेरे घर पे कभी मेरे ननिहाल से नानी.नाना की चिट्ठी आती तो कभी मेरी बुआ जी की, घर में मेरी माता जी अकेले हुआ करती थी और ऊपर से दिन भर का काम इसी काम की भीड़ में कभी-कभी पत्रों का जवाब नहीं दे पाती थी. मैं उस समय कक्षा ७-८ का स्टुडेंट था जब पहली बार माता जी ने मुझसे कहा की बुवा जी के पत्रों का जवाब लिख दो मैं पहली बार चिट्ठी लिखने जा रहा था मन में हर्ष के साथ-साथ ये भी लग रहा था की कही कुछ गलत न हो जाये, माताजी ने थोडा सा बता दिया और बुआ जी का आया हुआ पत्र भी मुझे पकड़ा दिया मैंने पत्र में पूछी गयी बातो का जवाब लिखते गया पहले तो मन में बड़े ख्याल थे ये लिखूंगा, वो लिखूंगा जब लिखने गए तो सारे के सारे भूल गए वैसे मैंने पत्र पूरा किया और बुआ जी के अगले पत्र का इंतजार करने लगा और मेरी उम्मीद के मुताबिक मेरी तारीफ भी लिखी थी पत्र में, बड़ा हर्ष हुआ लेकिन इसके साथ ही चिट्ठी लिखने की ज़िम्मेदारी भी मेरे ऊपर ही आ गई क्या करता लिखना ही था .
पहले हमारे जीवन में सन्देश आदान प्रदान का एक सशक्त माध्यम हुआ करता था पत्र, पत्रों में जो आत्मीयता रहती थी, जो इंतजार रहता था, जो प्यार रहता था वो आज हमारे पास नहीं है . माना की आज हमारे पास इस तकनीकी युग में सन्देश आदान प्रदान के अनेको माध्यम है परन्तु पत्रों वाली बात जिन्हें छिट्ठी कहते थे वो अब कहाँ ? अब तो कही भी अन्तेर्देशी पत्र नहीं दिखतें है बस उनकी यादें ही हमारे जीवन में रह गयी है. आज के इस मोबाइल और कंप्यूटर इ-मेल के युग में कहा रहेगा चिट्ठी का अश्तित्व लेकिन पत्रों के इंतजार में जो आनंद हुआ करता था अब कहाँ है? जो बातें हम पत्रों के माध्यम से कह सकते थे वो हम बोल कर नहीं कह सकते है क्यों की पत्र शांत मन से लिखा जाता था और कोशिश यही की जाती थी की इसमें कुछ ऐसा न लिख जाये जिस से पढने वाला दुखी हो जाये ..
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Thursday, April 7, 2011
आज़ादी जी जंग है हजारे का प्रयाश हम साथ है पूरा देश साथ है
आप सभी पाठकों को मेरा नमस्कार
आज बहुत दिन बाद कुछ लिखने का मन हुआ है सोच रहा था क्या लिखू? तभी मन में आया अन्ना हजारे के किये जा रहे सराहनीय प्रयाश का लोकपाल बिधेयक की मांग और भ्रष्टाचार पर उठाई जा रही उनकी आवाज़ जिससे सरकार की किरकिरी हो रही है और सरकार भी खूब है हमारे बेईमान नेतावों के ईमानदार सरदार जी ने कहा की अन्ना को किसी ने बहका दिया है जिससे वो अनशन पर बैठें है.लेकिन सरकार को ये पता होना चाहिए की अन्ना कोई बच्चे नहीं है जो वो किसी के बहकावे में आजायेंगे और अनशन कर देंगे. अन्ना को मिल रहे समर्थन से भी तो सरकार को ये पता होना चाहिए की अब देश सरकार का नहीं जनता का है जनता भी अब समझ गयी है की देश में क्या हो रहा है अब एक नहीं हज़ार अन्ना पैदा होंगे ये अभियान एक क्रांति का रूप लेगा और भारत की तश्वीर बदल देगा क्यों की अब इसी की जरुरत है बिना इस के कुछ भी नहीं हो सकता है इस देश का क्यों की देश के मुखिया को देश में क्या हो रहा है इसका पता होते हुए भी नहीं पता है. बेईमानों की फौज खड़ी कर रखी है सरकार ने महंगाई बढती जा रही है जनता त्रस्त है सरकार मस्त है.महंगाई को सरकार देश के विकास के लिए जरुरी मानती है लकिन कैसा विकास जब देश की जनता भूख से बिलख रही है जनता के पैसे से नौकरशाह ऐश कर रहे है, और आज जब अन्ना जैसा कोई समाज सेवी जनता की आवाज़ उठा रहा है तो सरकार कहती है की उन्हें बहकाया गया है नहीं ऐसा नहीं है. अन्ना ने तो किसी से नहीं कहा की आप मेरे साथ आवो बल्कि जनता को यह खुद लगने लगा है तो जनता उनके अभियान के साथ है और इसतरह के किसी भी अभियान में जनता साथ रहेगी. आज़ादी की जंग जैसी है यह लड़ाई और हम सब है क्रन्तिकारी जो देश को इस गुलामी से आजाद करने का संकल्प लेते है क्यों की बिना जनता के सहयोग के ऐसा कोई भी अभियान सफल नहीं हो सकता और इस अभियान का सफल होना जरुरी है अन्ना हजारे जैसा बुज़ुर्ग फौजी जब देश के लिए इतना कुछ कर सकते है तो हम युवा क्यों नहीं?हमें अपने आसपास समाज में होने वाले भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी,रिश्वत के खिलाफ मिलकर आवाज़ उठानी चाहिए और सिर्फ आवज़ ही नहीं उठानी चाहिए बल्कि इसे रोकने का प्रयाश भी करना चाहिए.
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Thursday, March 17, 2011
आप सभी लोगो को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं
आप सभी लोगो को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं
जी हाँ मित्रों मेरी तरफ से आप सभी को होली मुबारक हो, होली एक ऐसा पर्व है जिस से हमें लोगों से मिलने मिलाने का मौका मिलता है, होली रंगो का त्यौहार है और इन रंगों से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है जिस तरह कई रंग मिल कर एक नए रंग का रूप ले लेते है. उसी तरह हमें भी अपने जीवन में लोगो से हिल मिल कर रहना चाहिए न की बैर दुश्मनी से. ये रंग की छोटी सी पुडिया हमें रंगीन कर जाती है हमें इतनी बड़ी सीख दे जाती है और हम है की इन्सान हो कर भी अपना प्रभाव लोगो पर नहीं छोड़ पाते है. हमें भी कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे हमारे समाज में खुशहाली हो, अमन हो, न की कलह हो. होली हमें साफ सुथरा रहने की सीख देती है. क्या सिर्फ तन या कपडे साफ कर लेने से ही सब कुछ साफ हो जाता है ? नहीं . ऐसा नहीं है हमें तन और कपड़ो के साथ अपने व्यक्तित्व को भी साफ रखना होगा ..
आज कल तो होली का मतलब ही बदल गया है या यूँ कह लिया जाये की बदल दिया गया है होली पवित्रता और उल्लास, विजय का पर्व होता है लेकिन आज तो होली के दिन मदिरा पान करना आम चलन हो गया है. और दिनों से ज्यादा लोग इस दिन शराब पीते है शराब की दुकानों पर भीड़ जुटी होती है पीने वालों की, और फिर होता क्या है दारू के नशे में लोगो से झगड़ा करते है. कहा तक सही है ये सब क्या इस पबित्र पर्व पर नशा जरुरी है या ये सिर्फ पीने वालों की शरारत होती है..
हमें इस वर्ष होली पर यह संकल्प लेना चाहिए की हमें समाज से इन बुराइयों को मिटाना है एक सुन्दर और स्वच्छ समाज बनाना है न की नसे का समाज .
एक बार फिर आप सभी लोगों को होली की शुभकामनायें .
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Tuesday, March 1, 2011
भारत के लिए य़ू पी ए का आम बजट
भारत के लिए य़ू पी ए का आम बजट
जी हा दोस्तों इस बजट को आप भारत का नहीं बल्कि य़ू पी ए सरकार का ही आम बजट कहें तो बढ़िया होगा. क्यों की बजट में जो लोकलुभावन बातें कही गयी है उसमे से कम ही है जो पूरी होने वाली है. भारत की बीमार और गरीब जनता पर हमारे वित्त मंत्री ने एक उपहार और भी दे दिया है जिससे की अब उनका इलाज भी महंगा हो गया है बीमारी की जाँच भी महेंगी हो जाएगी, हमारे देश के बच्चो पर भी वो मेहरबान हुए है उनके भी कापी- किताब और स्टेशनरी को थोडा महँगा कर दिया है क्यों की आमिरों के बच्चो को तो इससे फर्क ही नहीं पड़ेगा और गरीबो के बच्चे पढेंगे नहीं क्यों की सरकार ये जानती है की गरीबों के बच्चे अगर शिक्षित हो जायेंगे तो सरकार की सारी नीतियों को समझने लगेंगे और उन्हें फिर वोट नहीं देंगे. वाह प्रणव दा क्या सोच के तीर मारा है आप ने महंगाई रोकने का कोई उपाय ही नहीं है इनके बजट में क्यों की कांग्रेस सरकार के हिसाब से देश में महंगाई है ही कहा जो रोकनी पड़े, नौ प्रतिशत का विकाश दर ले कर चले है हमारे नेता जी और वो पूरी कैसे होगी जनता के पैसे से गरीब जनता के पास खाने को पैसे नहीं है वर्ष २०१० अबतक का सबसे भ्रष्टतम वर्ष रहा है और अभी घोटालों की पोल खुलती जा रही है वाकई काबिले तारीफ है सरकार को तो शाबासी मिलनी चाहिए और मिल ही रही है देश के प्रधानमंत्री से जो बेईमान दल के ईमानदार नेता है उनकी मौन सहमति प्राप्त है घोटाले बाजो को, अनाज भण्डारण सुद्रिन करने की बात महज बेमानी लग रही है कहा तो ये पहले से जा रहा है लकिन किया क्या जा रहा है जिससे अनाज का उचित भण्डारण हो सके. क्यों प्रणव दा क्यों देश की जनता को मुर्ख बना रहे है आप के इस बजट में उन सारे लोगो के लिए तो सब कुछ है जिनके पास पहले से सब कुछ है लेकिन उनके लिए क्या है जिनके पास पहले से कुछ नहीं है. खेती किसानी पर भी थोडा रहम किया है मंत्री जी ने किसानो को चार प्रतिशत पर कर्ज उपलब्ध होगा लेकिन ये नहीं कहा की उस कर्ज के लिए किसान को बैंक मैनेजर के पास कितनी बार जाना होगा और कितना कमीशन मांगेगा.
कोई बात नहीं इस बजट में न सही अगले बजट में कुछ कर देना हम तो ऐसे ही है .
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Sunday, February 27, 2011
भारत के लिए विश्व कप २०११
भारत के लिए विश्व कप २०११ कैसा रहेगा ये तो वक़्त ही बताएगा . क्या भारत १९८३ विश्व कप की शानदार जीत को दुहरा पायेगा या इस बार भी देशवाशियों को निराश ही होना पड़ेगा अभी तक का भारत का खेल तो सराहनीय ही रहा है लेकिन सिर्फ रन बना लेने भर से ही मैच नहीं जीता जा सकता बल्कि मैच जीतने के लिए गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण को भी मजबूत करना होगा. एक तरफ भारतीय टीम में दुनिया के महानतम बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर समेत कई दिग्गज बल्लेबाज है वही टीम में अछे गेंदबाजों की कमी का एहसास साफ तौर पर देखने को मिल रहा है . भारतीय क्रिकेट टीम के साथ पुरे देश की उमीदे जुडी है और इनके जीत के लिए लोग भगवन से दुआएं भी कर रहे है लेकिन देखना ये है की टीम लोगो की उम्मीदों पर किस हद तक खरी उतरती है .
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Tuesday, February 22, 2011
वाह-वाह ये है मायावती की माया ..
जी हा इसे मायावती जी की माया ही कहेंगे की उनके गाजीपुर आने की खबर भर से ही रातो-रात गाजीपुर चमचमाने लगा जो अधिकारी पैसा ना होने का रोना रोते थे वो आज जोरो से काम करवा रहे है और करवाएं भी क्यों ना मुख्यमंत्री जो आने वाली है . लेकिन सवाल ये उठता है की क्या मायावती जी को ये नहीं दिखेगा की जो सड़के, बनी है वो कब की बनी है जो विकास कार्य हुआ है वो कितने दिन का है, और कहा से आया इतना पैसा, अगर विकास करना ही था तो पहले क्यों नहीं किया गया ? आम जनता को क्या मिलेगा इस दौरे से चार दिन के लिए चमचमाती मानक के अनुरूप ना बनने वाली सड़क जो एक ही बारिस के बाद ख़राब हो जाएगी और फिर शुरू होगी वही बदहाली जो पहले से चली आ रही है . कभी इसके बारे में सोचा है हमारे प्रदेश की मुखिया ने , एक बार जिला अस्पताल चले जाना एक बच्चे को गोद में उठा लेना कुछ नसीहत देना और भूल जाना क्या इस से हो जायेगा प्रदेश का विकास ? हमें विकास चाहिए सिर्फ और सिर्फ विकास हमें दिखावा नहीं चाहिए, हमें चार दिन की सड़क नहीं चाहिए बल्कि ऐसी सड़क चाहिए जो हमेसा सड़क जैसी दिखे जर्जर नहीं , हमें ऐसी बिजली की जरुरत है जो हमेशा रहे बल्कि ऐसे चोचले पन की नहीं जो कुछ दिन बाद शहर को फिर से अँधेरे में डूबा दे .
ये सारी तैयारियां उनके लिए हो रही है जिनको हमारे प्रदेश की गरीब जनता ने वोट दे कर मुख्यमंत्री बनाया है लेकिन ऐसा उस गरीब जनता के लिए क्यों नहीं किया जाता..
ऐसा तो प्रदेश की मुखिया को समझाना चाहिए..
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Thursday, February 10, 2011
उत्तर प्रदेश की मुखिया की जूती पर धूल कैसे हो सकता है ?
जी हाँ दोस्तों इतने बड़े प्रदेश की इतनी बड़ी मुखिया और उनके जूतों पर धूल ? वो भी सुरक्षा में लगे इतने अच्छे अधिकारीयों के रहते हुए कैसे हो सकता है, धूल की इतनी मजाल की वो मुखिया के जूतों पर लग जाये उसे आम आदमी का चेहरा नहीं मिला था जो वो जूतों पर लगने गयी थी ये वाकिया कुछ दिन पहले मायावती जी के दौरे की है जब डी.एस. पी रंक के एक अधिकारी ने उनके जूतों की धूल सरेआम अपनी रुमाल से साफ़ की थी और विपक्ष तथा मीडिया ने इस मामले को तूल पकड़ा दिया लेकिन विपक्ष को यह जान लेना चाहिए की डी.एस. पी साहब मुखिया जी की सुरक्षा में लगे थे और धूल से उनकी सुरक्षा को खतरा है ऐसा सरकार के लोगो का कहना था और उनकी हर तरह की सुरक्षा करना साहब का कर्त्तव्य बनता है. लेकिन यहाँ सवाल ये उठता है की क्या धूल सिर्फ उनके जूतों पर लगी होगी जब इतनी धूल जूतों पर लग सकती है तो कुछ तो धूल उनके चेहरे पर भी लगी रही होगी चेहरे की धूल क्यों नहीं साफ़ की साहब ने क्या उस से उनकी सुरक्षा को खतरा नहीं था और हाँ एक सवाल और है की जिस उड़न खटोले से प्रदेश की मुखिया उड़ती है वो भी तो धूल उडाता है. क्या प्रदेश प्रमुख ने कभी ये सोचा है की वो धूल कहा जाती होगी किसके चेहरे पर, किसके जूते पर लगती होगी कौन करता होगा उन्हें साफ़ ? जिस प्रदेश की जनता ने उन्हें वोते दे कर प्रदेश की मुखिया बनाया कभी सोचा है उन्होंने की वे मजदूर जो दिन-रात उसी धूल में कम करते है तब जा कर कहीं उन्हें दो वक्त की रोटी नसीब होती है उनकी धूल कौन साफ़ करता होगा ? वो दलितों की नेता बनती है शोषितों के नेता बनती है लेकिन उन दलितों को उनसे सवाल करना चाहिए की जो पैसा उनके विकास में लगना चाहिए था वो उन्होंने अपनी मूर्ति और हाथी में लगा दिया इससे क्या मिला उन लोगो को जिनका वो पैसा था सिर्फ और सिर्फ धूल ? उनके जूतों पर लगी धूल तो उनकी सुरक्षा में लगे अधिकारी साफ़ कर ही देंगे क्यों की उनके पास और कोई काम जो नहीं है जनता के काम से उन्हें मतलब नहीं है जनता को तो डी.एस. पी साहब जैसे अधिकारी अपने रौब से डरा धमका कर और अपना क्राइम का ग्राफ कम करने के लिए फर्जी मुकदमो में फसा देते है. लेकिन साहब करे भी तो क्या करें प्रदेश की मुखिया का जो सवाल है और प्रमोसन भी तो चाहिए.
लगे रहिये साहब ऐसे ही कम से आप का और देश का और आप के डिपार्टमेंट का नाम बढेगा.
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Wednesday, January 26, 2011
राष्ट्र ध्वज पर सियासत
भारत का ६२ वाँ गणतंत्र दिवस और इस पावन पर्व पर भी देश की शान तिरंगे झंडे पर राजनैतिक दलों की सियासत, क्या जनता का ये हक़ नहीं बनता की वो सरकार से पूछ सके की क्यों की जा रही है ये सियासत, कैसे चलेगा ये देश, क्या हमारे देश के नेता उन वीरो की क़ुरबानी भूल गए जिन्होंने इस देश की शान इस तिरंगे की शान में अपने जान की बाज़ी लगा दी और अपनी जान दे कर भी तिरंगे की शान बचाई थी. श्रीनगर के लाल चौक पर बीजेपी कार्यकर्ताओं को उम्र अब्दुल्ला सरकार और हमारे देश की कांग्रेस सरकार ने झंडा न फहराने दे कर देश की शान पर बट्टा लगाने का काम किया है. अगर कांग्रेस ये कहती है की भाजपा श्रीनगर के लालचौक पर झंडा फरहाने के मामले को टूल दे रही है तो क्या कांग्रेस का ये फर्ज नहीं बनता की वो ही लाल चौक पर झंडा लहरा दे . कांग्रेस और उम्र अब्दुल्ला सरकार तो अब कश्मीर का भारत का हिस्सा मानते ही नहीं है और हमारी इसी सोच का नतीजा है की हमारे पडोसी मुल्क लगातार हमारे खिलाफ षड़यंत्र किये जा रहे है और हमारी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है सरकार को ये जवाब देना होगा की आखिर क्यों किया जा रहा है ऐसा क्या वो लाल चौक पर पकस्तानी झंडा लहराना देझ्ना चाहते है या अपने देश को एक बार उन शहीदों की क़ुरबानी को धुल में मिला कर देश को गुलाम बनाना चाहते है. इसका जवाब देना होगा सरकार को .........
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Monday, January 24, 2011
अमर रहे गणतंत्र हमारा
"अमर रहे गणतंत्र हमारा, हो मुक्त सदा भारत माता
जन-जन के मन में बहती हो, निज देश प्रेम की पावन सरिता."
मैं ६२ वें गणतंत्र दिवस पर आप सभी देशवासियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ . साथ ही यह विश्वास व्यक्त करता हूँ की हमारा गणतंत्र अमर रहे . १५ अगस्त १९४७ को भारत माता की सदियो पुरानी गुलामी की जंजीरे चटाख से टूट गयी . भारत के नील गगन पर अपूर्व आलोक छा गया . स्वतंत्रा का स्वर्णिम प्रभात देखने के लिए हम आठ सौ बर्षो से तरसते रहे और जिसे हमने लाखों देश के सपूतों के बलिदान से प्राप्त किया.लेकिन हमारा देश पूर्णरूप से गणतंत्र २६ जनवरी १९५० को हो सका जब हमारे देश में हमारा संबिधान लागू हुआ . वो पल हम सब देश वाशियों के लिए गर्व का पल था . लेकिन सवाल ये उठता है की क्या हम अपने देश की एकता , अखंडता को बरक़रार रख सके है ? यह एक प्रश्न नहीं बल्कि पुकार है . देश के ही अनेक हिस्सों में हमारे देश की शान तिरंगा झंडा जिसे जलाया जा रहा है उसका अपमान किया जा रहा है जिस तिरंगे झंडे को फहराने के लिए हमने लाखों सपूतों की क़ुरबानी दे दी आज उसी झंडे को देश में अपमानित किया जा रहा है, और हमारे देश की शीर्ष सत्ता हाथ पर हाथ धरे बैठी है . बैठे भी क्यों न ? उसे तो देश की एकता, अखंडता से क्या लेना देना उसे तो अपनी कुर्सी प्यारी है सरकर को ये जान लेना चाहिए की सिर्फ लाल किले की प्राचीर से तिरंगा लहरा देना और चंद भाषण दे देना ही तिरंगा का सम्मान नहीं है बल्कि देश में के हर हिस्से में उसका सम्मान होना चाहिए. श्रीनगर के लाल चौक पर भाजपा के झंडा फहराने का वहा के मुख्यमंत्री समेत भारत सरकार भी प्रबल विरोध कर रही है. सरकार को ये तो समझ लेना चाहिए की कहीं उसकी ये अनदेखी उसके लिए महँगी न पड़ जाये. उस सरकार को देश की सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए जो देश के तिरंगे का सम्मान नहीं कर सकती .
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Sunday, January 23, 2011
Friday, January 21, 2011
भविष्य भारत का हम ही हैं
भविष्य भारत का हम ही हैं युवा
अभिषेक सिंह
" जब साथ उठेंगे कदम युवा तो क्यों न जागेगा भाग्य
आँखों में सुनहरे सपने है और सीने में छुपी है आग "
आज भारत विश्व में युवावों का देश कहा जा रहा है. लेकिन इस बात के साथ क्या ये तथ्य नहीं छुपा है की आज का युवा अपने पथ से भटक रहा है? जो जोश , जूनून युवावों में होना चाहिए उसकी कमी नहीं हो रही है? हमारा युवा देश आज इस पीड़ा से तड़प रहा है की कही ऐसा न हो की हमारी ये युवा पीढ़ी अपने मार्ग से इतनी भटक जाये की सम्हालना मुस्किल हो जाये. आज हमारा युवा नशाखोरी, अपराध अनेक प्रकार के बुरे कामो में फसते जा रहा है और इसके पीछे कही न कही समाज के बुरे लोगो का हाथ होता है वो युवावों को अपने लाभ के लिए गलत कामों में लगा देते है . युवा मन तो गीली मीटी के सामान होता है उसे जैसा बनाया जायेगा वैसा बनेगा लकिन युवावों को इन असामाजिक लोगो से बच के रहने की जरुरत है. सिर्फ ऐसा ही नहीं है की हमारे देश की युवा पीढ़ी पथ भ्रस्ठ हो रही है बल्कि देश में ही नहीं वरन देश के बाहर भी अपना और देश का नाम रौशन कर रही है नित नए आयाम बना रही है. इस गणतंत्र दिवस
पर युवा वर्ग को देश प्रेम की भावना के साथ आगे आना चाहिए और अपने भविष्य के लिए, देश के भविष्य के लिए अपने समाज के विकाश के लिए समर्पण की भावना के साथ काम करना चाहिए इसी में हमारे देश हमारे समाज और हमारा हित है. मेरे लिखी हुई इन बातो को आप अपने मन की ही बात समझे क्यों की जब भी कोई युवा की गलत रास्ते पर चलता है तो कही न कही रूखे पर उसे अपनी गलती का एहसास हो जाता है लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है.
मै भी एक यूवा हूँ आप आप ही लोगो के बीच का हूँ.
अभिषेक सिंह
Thursday, January 20, 2011
Indian Education System.......
Namskar Doston..........
Itne sare sawal hai mere man me , mere hi man me nahi balki har us middle class family me rehne wale ke man ki bat hai ye, sare log yahi janna chahte hai .. Din par din collages ki fees badhti ja rahi hai , kitabe mahangi hoti ja rai hai , sarkar janti hai ki padhna to hamari majburi hai kahi se padhe , sarkar hame sakshar karna chahti hai shikshit nahi kyo ki jab ham shikshit ho jayenge to sarkan ki neetiyon ko samajh jayenge aur sarkar kabhi ye nahi chahegi.Schollership ke nam pe kuchh logo ke hatho me chand rupaye pakda tehi hai sarkar aur log khush ho jate hai ..
Ji ha doston, bharat ke liye ye sawal jawalant hai . Kaisi hai hamara education system? Kitna kuchh shikh pate hai ham apne education system se? Garibo ke liye higher education kitna prabhawi hai jis se ki wo aage badh saken?
Itne sare sawal hai mere man me , mere hi man me nahi balki har us middle class family me rehne wale ke man ki bat hai ye, sare log yahi janna chahte hai .. Din par din collages ki fees badhti ja rahi hai , kitabe mahangi hoti ja rai hai , sarkar janti hai ki padhna to hamari majburi hai kahi se padhe , sarkar hame sakshar karna chahti hai shikshit nahi kyo ki jab ham shikshit ho jayenge to sarkan ki neetiyon ko samajh jayenge aur sarkar kabhi ye nahi chahegi.Schollership ke nam pe kuchh logo ke hatho me chand rupaye pakda tehi hai sarkar aur log khush ho jate hai ..
Bat khush hone ki nahi hai balki janne ki hai ki kitna kuchh ham shikh pate hai apne education system se , kya ye gyan jo hame diya ja raha hai ye sirf kitabi nahi hai? Sirf kitabi gyan se janta ka bhala nahi hone wala hai, janta ke bhale ke liye rozgar parakh shiksha honi chahiye system me jo nahi hai, aur agar hai bhi to itni mehangi hai ki aam aadmi ke bas me nahi hai...
Aap bhi apne vichar de sakte hai .. mere is blog par ..
Abhishek Singh
Ghazipur
Wednesday, January 19, 2011
भारत में भ्रस्टाचार
जी हा ,
'' मैंने जो ये title दिया है सायद आप लोगो ने कई बार सुना हो लेकिन इस के बाद भी मैंने यही कहा भारत में भ्रस्टाचार. इस सरकार में यही तो हो रहा है कही भी शांति नहीं गरीब जनता महंगाई से त्रस्त है और हमारी सरकार है की अपनी वाह वाही में ही लगी है सरकारी मंत्री जी की तो पूछो मत ये तो अपनी ही जेबें भरने पर लगे हुए है commonwealth खेल हो या २जी घोटाला सब तरफ लूट मची है ॥ पेट्रोल के दाम दिन पर दिन बढ़ते जा रहे है और सरकार ने खुली छुट दे रखी है. देश में terrorist आते है देश पर हमला करते है और पकडे जाने पर हम उन्हें सालो तक बैठा कर उनकी सेवा करते है. कहा तक सही है ये सब? ... इन सब सवालो के जवाब हमें कांग्रेस से चाहिए ॥ देश के ही एक हिस्से कश्मीर में देश का तिरंगा जलाया जा रहा है और सरकार है की चुप बैठी
है ... दोस्तों इन सब सवालो के जवाब हमें सरकार से चाहिए की जिस जनता ने उन्हें भारत की सत्ता पे पहुचाया उनके लिए वो क्या कर रही ..''
कृपया इस पर अपनी राय दे ... धन्यवाद
'' मैंने जो ये title दिया है सायद आप लोगो ने कई बार सुना हो लेकिन इस के बाद भी मैंने यही कहा भारत में भ्रस्टाचार. इस सरकार में यही तो हो रहा है कही भी शांति नहीं गरीब जनता महंगाई से त्रस्त है और हमारी सरकार है की अपनी वाह वाही में ही लगी है सरकारी मंत्री जी की तो पूछो मत ये तो अपनी ही जेबें भरने पर लगे हुए है commonwealth खेल हो या २जी घोटाला सब तरफ लूट मची है ॥ पेट्रोल के दाम दिन पर दिन बढ़ते जा रहे है और सरकार ने खुली छुट दे रखी है. देश में terrorist आते है देश पर हमला करते है और पकडे जाने पर हम उन्हें सालो तक बैठा कर उनकी सेवा करते है. कहा तक सही है ये सब? ... इन सब सवालो के जवाब हमें कांग्रेस से चाहिए ॥ देश के ही एक हिस्से कश्मीर में देश का तिरंगा जलाया जा रहा है और सरकार है की चुप बैठी
है ... दोस्तों इन सब सवालो के जवाब हमें सरकार से चाहिए की जिस जनता ने उन्हें भारत की सत्ता पे पहुचाया उनके लिए वो क्या कर रही ..''
कृपया इस पर अपनी राय दे ... धन्यवाद
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