जी हाँ दोस्तों इतने बड़े प्रदेश की इतनी बड़ी मुखिया और उनके जूतों पर धूल ? वो भी सुरक्षा में लगे इतने अच्छे अधिकारीयों के रहते हुए कैसे हो सकता है, धूल की इतनी मजाल की वो मुखिया के जूतों पर लग जाये उसे आम आदमी का चेहरा नहीं मिला था जो वो जूतों पर लगने गयी थी ये वाकिया कुछ दिन पहले मायावती जी के दौरे की है जब डी.एस. पी रंक के एक अधिकारी ने उनके जूतों की धूल सरेआम अपनी रुमाल से साफ़ की थी और विपक्ष तथा मीडिया ने इस मामले को तूल पकड़ा दिया लेकिन विपक्ष को यह जान लेना चाहिए की डी.एस. पी साहब मुखिया जी की सुरक्षा में लगे थे और धूल से उनकी सुरक्षा को खतरा है ऐसा सरकार के लोगो का कहना था और उनकी हर तरह की सुरक्षा करना साहब का कर्त्तव्य बनता है. लेकिन यहाँ सवाल ये उठता है की क्या धूल सिर्फ उनके जूतों पर लगी होगी जब इतनी धूल जूतों पर लग सकती है तो कुछ तो धूल उनके चेहरे पर भी लगी रही होगी चेहरे की धूल क्यों नहीं साफ़ की साहब ने क्या उस से उनकी सुरक्षा को खतरा नहीं था और हाँ एक सवाल और है की जिस उड़न खटोले से प्रदेश की मुखिया उड़ती है वो भी तो धूल उडाता है. क्या प्रदेश प्रमुख ने कभी ये सोचा है की वो धूल कहा जाती होगी किसके चेहरे पर, किसके जूते पर लगती होगी कौन करता होगा उन्हें साफ़ ? जिस प्रदेश की जनता ने उन्हें वोते दे कर प्रदेश की मुखिया बनाया कभी सोचा है उन्होंने की वे मजदूर जो दिन-रात उसी धूल में कम करते है तब जा कर कहीं उन्हें दो वक्त की रोटी नसीब होती है उनकी धूल कौन साफ़ करता होगा ? वो दलितों की नेता बनती है शोषितों के नेता बनती है लेकिन उन दलितों को उनसे सवाल करना चाहिए की जो पैसा उनके विकास में लगना चाहिए था वो उन्होंने अपनी मूर्ति और हाथी में लगा दिया इससे क्या मिला उन लोगो को जिनका वो पैसा था सिर्फ और सिर्फ धूल ? उनके जूतों पर लगी धूल तो उनकी सुरक्षा में लगे अधिकारी साफ़ कर ही देंगे क्यों की उनके पास और कोई काम जो नहीं है जनता के काम से उन्हें मतलब नहीं है जनता को तो डी.एस. पी साहब जैसे अधिकारी अपने रौब से डरा धमका कर और अपना क्राइम का ग्राफ कम करने के लिए फर्जी मुकदमो में फसा देते है. लेकिन साहब करे भी तो क्या करें प्रदेश की मुखिया का जो सवाल है और प्रमोसन भी तो चाहिए.
लगे रहिये साहब ऐसे ही कम से आप का और देश का और आप के डिपार्टमेंट का नाम बढेगा.
अभिषेक सिंह
गाजीपुर


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