Saturday, January 12, 2013

नमस्कार दोस्तों आप सभी को मकरसंक्रांति की ढेर सारी शुभकामनायें .

      बहुत दिनों बाद आज कुछ लिखने की ललक जगी है दिल में, व्यस्तता की वजह से अपने विचार आप लोगों से शेयर नहीं कर पा रहा था। आज फुर्सत मिली सो अपने दिल की बात ब्लॉग के माध्यम से कहने की जिज्ञासा ने आज फिर से  कंप्यूटर के पास बैठने को प्रेरित किया है।
      इन्सान की ज़िन्दगी में कभी न कभी कुछ न कुछ एसे पल आते ही हैं जब उसे थोड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है लेकिन कठिनाइयो से इन्सान को जो शीख मिलती है वो जीवन के लिए बहुत उपयोगी होती है। वर्ष 2012 में मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ की ज़िन्दगी के इस कठिन दौर ने मुझे जो भी शिखाया जो महसूस कराया उसके दम पर आज मेरे अन्दर जो आत्मविश्वाश जगा है शायद ज़िन्दगी का मेरे लिए एक अनमोल उपहार है। अगस्त 2012 को अचानक मेरी साढ़े तीन वर्ष से चल रही नौकरी का चले जाना और मन में विचारों का वो तूफान की अब क्या करें लेकिन ज़िन्दगी के सारे रंगों के बीच भी कहीं न कहीं आप के लिए कुछ बचा जरूर होता है मेरे थोड़े से प्रयास से दो दिनों बाद ही मुझे नयी जगह नौकरी मिल गयी साथ ही साथ सीखने का वो सुनहरा मौका की मुसीबतों के समय भी इंसान को धैर्य नहीं खोना चाहिए क्या जाने आप के लिए कोई नया रास्ता इंतज़ार कर रहा हो आप की मंजिल कहीं और हो।  निक ने साथ किया गया मेरा लगभग चार साल का काम और वहां के लोगों का सहयोग आज भी मुझे याद है वो आत्मीयता वो लगाव जो मुझे निक गाजीपुर में मिला खाश कर के विजय सर का स्नेह , प्यार, मुझे समझाना कभी प्यार भरी डांट मुझे दी गयी उनकी सारी सीख जो मुझे अपना करियर आगे बढ़ने के लिए मददगार हो रही है। फिर शुरू होता है सहज के साथ तयं  किया गया तीन महीने का सफ़र वो टीम भावना से काम करना एक दुसरे से मजाक, हंसी के वो पल फील्ड से आने के बाद टी स्टाल पर गप्पों की लड़ियाँ काम का  वो दबाव जो एक सेल्स एग्जीक्यूटिव की ज़िन्दगी में होता है, के बीच मस्ती के वो भी पल जो पूरी ज़िन्दगी में नहीं भूले जा सकते हैं।लेकिन इस सफ़र को भी मैंने छोड़ दिया और चला आया एक नए और अनोखे सफ़र पर एच . आई . वी/ एड्स जागरूकता का सफ़र जिसमे ली गयी ट्रेनिंग वर्कशॉप और मऊ  में दी गयी पांच दिवसी ट्रेनिंग ने मुझे एक ऐसे पटल पर ला कर खड़ा कर दिया जहाँ मुझे अपनी प्रतिभा निखारने के साथ- साथ खुद को शाबित भी करना था की मैं लगभग पचास लोगों को सही से एक अतिसंवेदंसील मुद्दे पर ट्रेनिंग दे पाउँगा की नहीं लेकिन किस्मत ने मेरा साथ दिया और मई अपने आप को शाबित करने में कामयाब रहा। लेकिन फिर शुरू हुआ एक नया सफ़र पानी संस्थान फैजाबाद उत्तर प्रदेश के साथ यूनिसेफ के सपोर्ट से जौनपुर उत्तर प्रदेश में चल रहा बाल आधिकार संरक्षण कार्यक्रम जिस में मैं बर्तमान समय में मछली शहर ब्लाक में ब्लाक कोऑर्डिनेटर की पोस्ट पर कार्य कर रहा हूँ और अपने शिखने शीखाने के दौर को ज़ारी रखा हूँ। 



                                                                                             अभिषक सिंह 
                                                                                               गाजीपुर 

Wednesday, March 21, 2012

राजनीति और जातिवाद

आप सभी पाठकों को मेरा प्रणाम ,

           राजनीति में जातिवाद आज के चुनावी माहौल का एक महत्वपूर्ण अंग  बन गया है, और हो भी क्यों न हमारे इतने अच्छे राजनेता जो है, अपने लाभ के लिए देश की भोली-भाली जनता को ऐसे बहका देते है जैसे कोई पथिक अपना रास्ता भूल जाता है, और जनता का भी क्या है, अपने तत्काल भावना को रोक नहीं पाती और बह जाती है उसी धारा में जिस धारा में हमारे राजनेता ले जाना चाहते है, इस रास्ते पर चल कर लाभ तो सिर्फ नेतावों को मिलता है, और जनता को कुछ नहीं हाँ,  इतना जरुर मिलता है कि हो सके किसी जाति की संख्या ज्यादा हो तो उस जाति का कोई बिधायक सा सांसद हो जाये लकिन वो नेता जी सत्ता में आने के बाद करते क्या है ? क्या इसका हिसाब हमने कभी लिया है उनसे ? नहीं, पांच सालों बाद कोई फिर से आता है जाति और धर्म के नाम पर हमसे वोट मांगता है और फिर उसके दर्शन नहीं होते है. क्यों नहीं समझते हम कि देश का विकास जाति, धर्म, संप्रदाय, से नहीं सही सोच से होता है सही काम करने से होता है. और राजनितिक दल तो  सारी सीमायें ही पार कर गये है. जाति और धर्मं के आधार पर एक दुसरे को भड़काया क्यों करते ऐसा सिर्फ सत्ता में रहने के लिए. लेकिन क्या करते हैं कुर्सी पाकर भी देश की जनता के लिए करते क्या है? आपस में बयान बाज़ी, आरोप-प्रत्यारोप, घोटाले,भ्रष्टाचार,अत्यधिक संपत्ति बनाना यही तो करते है. और हम कभी पूछते भी नहीं की देश की जनता का पैसा कहाँ और कब खर्च किया जा रहा है.एक बुजुर्ग  ने देश में ऐसी लहर पैदा की थी  भ्रष्टाचार के खिलाफ लेकिन क्या किया हमने कुछ नहीं भूल गये उस आन्दोलन को और फिर से वही काम जाति, धर्म, सम्प्रदाय के नाम पर लड़ना झगड़ना, अपने पन की कमी ही हमें इस राश्ते पर ले आयी है जहाँ ये नेता हमें गुमराह के अपने लाभ के लिए हमारा इस्तेमाल करते है और फिर छोड़ देते है हमें हमारे हाल पर और हम भी भूल जातें है वो उनकी गलतियों को और फिर वही इतिहास दुहराया जाता है हम वही के वही खड़े रह जातें है या यूँ कह लीजिये थोड़ी चलने की कोशिश के बाद बैठ जातें है. हम एक होना ही नहीं चाहते. अगर हमें अच्छे डॉक्टर कि जरुरत हो तब हम जाति नहीं पूछते, अच्छे वकील कि जरुरत हो तो हम जाति नहीं पूछते तो फिर अच्छे नेता कि बात हो तो हम जाति क्यों पूछते है विकास क्यों नहीं  पूछते. दोस्तों मेरा आप सभी से निवेदन है कि आप निकलिए इस जाति-पात के बंधन से और देश के विकास के बारे में सोचिये, ये नेता हमे अपने लाभ के लिए बाँटना चाहते है हमारा विकास नहीं चाहते है.


                                                                                                         अभिषेक सिंह
                                                                                                           गाजीपुर        

Saturday, August 20, 2011

भ्रस्टाचार क्या है ?

          आखिर क्या है भ्रस्टाचार, क्यों हो रहा है ये हो हल्ला, क्या हम जारी रख पाएंगे अन्ना जी के द्वारा श्हुर किये गए इस आन्दोलन को, या कुछ दिनों बाद हम फिर से भूल जायेंगे इस  आन्दोलन को ? ये सारे सवाल है जो हमारे जेहन में कौध रहे है क्या करें हम भारत वासी जो है, हमें गर्व है भारत वासी होने का लेकिन क्या करें भ्रस्टाचार तो यहाँ के लोगों के जेहन में है सरकार भ्रष्ट, सरकारी मुलाजिम भ्रष्ट और तो और जनता भी भ्रष्ट. क्या लगता है सिर्फ कुछ दिन तक सडको पर उतर कर सरकार के खिलाफ नारेबाजी करके हम भ्रस्टाचार मिटा सकते है. नहीं..  सिर्फ यही  करने से हमारे देश से भ्रस्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता इसे जड़ से खत्म करने का सबसे अचूक तरीका है जैसे हम आज जागरूक हुए है वैसे हमें हमेसा जागरूक होना पड़ेगा, अपने हक़ के लिए लड़ना पड़ेगा, इस देश के हर नागरिक का क्या अधिकार है ये जानना होगा, जो क्रांति अन्ना जी ने शुरू की है उसे सदा आगे बढ़ाना होगा, अगर ७४ साल की उम्र में अन्ना जी सरकार को घुटनों के बल ला सकते है तो इस देश का हर नागरिक अगर आगे आये तो क्या कुछ नहीं हो सकता है.







                                                                           अभिषेक सिंह 
                                                                              गाजीपुर

Tuesday, August 9, 2011

कहानी गरीबी की

            कोई न कोई घटना ,दुर्घटना रा यूँ कह लीजिये संजोग तो सब के साथ होता रहता है, दुनिया का ऐसा कौन सा इन्सान होगा जिसके जीवन में कोई ऐसी बात न हुई हो जिसने उसके मन पर कुछ असर न डाला हो, न भी डाला हो तो मै औरों की बात कैसे कर सकता हु लेकिन मेरे मन पर तो ऐसी एक घटना ने गहरा प्रभाव छोड़ा है और वो घटना मुझे कभी भूलती नहीं है.
      
           मैंने बड़े करीब से देखा है गरीबी को क्यों की मै एक छोटे से ग्रामीण परिवार का रहने वाला हु और गावों में आज भी गरीबी का मंजर देखने को मिलजाता है, मैंने उस गरीबी को देखा है जब जड़े के सर्द मौसम में भी गरीब परिवार के बच्चों के पास तन ढके के लिए गर्म कपडे नहीं होते थे और खाने के लिए भोजन भी नहीं होता था , आज कल तो बड़े बड़े दावे किये जा रहे है कि भारत समृद्ध हो रहा है यहाँ गरीबी कम हो रही है, कहाँ कम हो रही है गरीबी और कहा भारत समृद्ध हो रहा है, क्या देश के गिने चुने लोगों के आमीर हो जाने से देश में गरीबी ख़त्म हो जाएगी या देश का विकास हो जायेगा ? कभी नहीं. गरीबी तो आज भी है  हमारे देश में और आज भी बहुत सारे लोग है जिन्हें खाना भी नसीब नहीं होता है , आज भी बच्चे स्कूल जाने कि उम्र में अपना बचपना भुला कर ढाबों पर, होटलों में, कारखानों पर और अमीरों के घरों में, नालियों में कुडों के ढेर पर से प्लास्तिच्क इकठ्ठा करते दिख जाते है और हम कहते है कि गरीबी कम हो रही है     
         मै आप को अपने जीवन कि एक घटना सुनाता हूँ , मै उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के छोटे से गाँव कटघरा का रहने वाला हु , आज मेरी उम्र लगभग २५ वर्ष है और मुझे याद है जब मेरी उम्र लगभग १३-१४ वर्ष कि रही होगी . मैं अपने गाँव में कुछो दोस्तों के साथ खेल रहा था कभी मैंने देखा कि मेरे गाँव में एक बीमार और बूढी औरत जो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी लोगों के घरों के पास जा कर कुछ खाने को मांगने लगी, देखने में वह औरत इतनी कुरूप और गन्दी लग रही थी कि लोग उसे कुछ देने कि बजाय अपने घर से भगाने लगे मुझे यह देख बड़ा आश्चर्य हुआ कि दुनिया में कितने निर्दयी लोग भी होते है एक तो लोग उसे कुछ दे नहीं रहे थे और ऊपर से झिडकियां भी सुना रहे थे. मुझे उस दिन पता चला कि गरीबी इन्सान से क्या कुछ नहीं करा देती है . फ्री भी वह बूढी लचर औरत हर दरवाजे गयी लेकिन हर जगह उसे वही झिडकियां ही मिली . यह देख मेरा मन दादा द्रवित हुआ और मै वहां से दौड़े दौड़े अपने घर आया अपनी माता जी से साडी बात बताई, मेरी माता जी ने कहा बेटे उसे यहाँ बुला लाओ वैसे मुझे पता था कि घर में खाना समाप्त हो चूका था क्यों कि दोपहर बाद का समय था और घर के सारे सदस्य खाना खा चुके थे, फिर भी मैं दौड़ते हुआ वापस गया लेकिन तब तक वो औरत वहा से कहीं जा चुकी थी मैंने आस पास लोगों से पूछा तो किसी ने कुछ बताया नहीं मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ कि मैंने उस लचर औरत कि कोई मदद नहीं कि मैंने फिर भी उसे ढूढना सुरु किया, लगभग २०-२५ मिनट कि तलाश के बाद वो और मुझे गाँव के ही एक जगह मिल गयी मैंने उससे कहा " आजी हमरे घरे चला तोहके हमार मम्मी बोलावलस ह " ये बात सुन कर वो औरत जिसे देख कर ही लग जा रहा था कि उसे कई दिन से भूखी है बड़ी खुश हुई और मेरे साथ मेरे घर आयी, मेरी माता जी ने उसके लिए शरबत बनाया और उसे भुजा जिसे गाँव में "दाना" भी कहता है खाने को दिया और उसे तन ढकने के लिए एक साड़ी भी दी और बदले में उस औरत बूढी औरत ने हमें दुनिया कि अमूल्य चीज जिसे हम आशीर्वाद कहते है दिया जिसके लिए हम मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे जाते हैं वो हमें देदी स्वरुप बूढी दादी से वही मिल गया. इस कम से मुझे जो आत्मीय संतोष मिला वो मै बयां नहीं  कर पा रहा हूँ. अपनी सारी बात उस औरत ने कह सुनाई और बताया कि एक मुसहर जाती कि है, गरीबी ने उसे इस कदर परेसान कर रखा था कि उसे पेट भरने के लिए रोटी और तन ढकने के लिए कपडा भी नहीं था, वह औरत लालची नहीं बल्कि स्वाभिमानी थी उसने अपने से कभी खाने के सिवाय और कुछ नहीं माँगा, सालों तक को महीने में एक बार मेरे घर जरू आती और वो अमूल्य आशीर्वाद हमें दे जाती, हमारे परिवार को भी जैसे उसके आशीर्वाद कि आदत सी हो गयी थी. कुछ सालों बाद उस बूढी दादी का आना बंद हो गया और मै भी तब तक घर से बहार पढाई के लिए चला गया एक बार मुझे उसकी याद आयी मैंने माता जी से पूछ तो पता चला कि वो तो अब इस दुनिया में नहीं रही सुन कर बड़ा दुःख हुआ पर मन को संतोष भी था कि चलो मैंने कभी उनकी मदद तो कि. वैसे मुझे लगता है कि उनका आशीर्वाद आज भी हमारे साथ है और हमारे उन्नति में सहायक है . 


                                                                                                                                                                                                                                    अभिषेक सिंह

Sunday, July 24, 2011

पंथनिरपेक्ष ढांचे पर प्रहार

अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के अपने एजेंडे पर प्रतिबद्ध संप्रग सरकार एक ऐसा कानून बनाने जा रही है जो सांप्रदायिक सौहार्द को नष्ट-भ्रष्ट कर सकता है, संविधान की संघीय विशेषताओं को कमजोर कर सकता है और केंद्र सरकार को राज्यों के शासन में दखल देने के नए बहाने उपलब्ध करा सकता है। प्रस्तावित विधेयक को सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम बिल नाम दिया गया है और इसका जो उद्देश्य बताया जा रहा है वह सांप्रदायिक संघर्ष की घटनाओं पर अंकुश लगाना, लेकिन इसका निर्माण इस पूर्वाग्रह के साथ किया गया है कि सभी स्थितियों में धार्मिक बहुसंख्यक ही अल्पसंख्यक समुदाय पर जुल्म करता है। लिहाजा बहुसंख्यक समाज के सदस्य दोषी हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग पीडि़त। चूंकि यही धारणा इस कानून का आधार है इसलिए यह स्वाभाविक है कि प्रस्तावित कानून 35 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में से 28 में बहुसंख्यक हिंदुओं को सांप्रदायिक हिंसा के लिए जिम्मेदार मानता है और मुस्लिम, ईसाई तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को पीडि़त के रूप में देखता है। इस कानून का मसौदा उस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने तैयार किया है जो छद्म सेक्युलरिस्टों, हिंदू विरोधियों और नेहरू-गांधी परिवार के समर्थकों का एक समूह है और कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी जिसकी अध्यक्ष हैं। इस परिषद को केंद्र की एक ऐसी सरकार से बराबर महत्व मिल रहा है, जिसका नेतृत्व पहली बार अल्पसंख्यक समाज के एक सदस्य द्वारा किया जा रहा है। इस प्रस्तावित कानून के प्रावधान ऐसे हैं कि यह सांप्रदायिक सौहार्द को प्रोत्साहन देना तो दूर रहा, हिंदुओं के बीच पंथनिरपेक्षता की प्रतिबद्धता को ही कमजोर कर सकता है। विधेयक के मसौदे के अनुसार यदि किसी समूह की सदस्यता के कारण जानबूझकर किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसा कृत्य किया जाए जो राष्ट्र के सेक्युलर ताने-बाने को नष्ट करने वाला हो..। सबसे बड़ी शरारत शब्द समूह की परिभाषा में की गई है। इसमें कहा गया है कि समूह का तात्पर्य भारत के किसी राज्य में धार्मिक अथवा भाषाई अल्पसंख्यक या अनुसूचित जाति अथवा जनजाति से है। इसका अर्थ है कि हिंदू, जो आज ज्यादातर राज्यों में बहुसंख्यक हैं, इस कानून के तहत समूह के दायरे में नहीं आएंगे। लिहाजा उन्हें इस कानून के तहत संरक्षण नहीं मिल सकेगा, भले ही वे मुस्लिम अथवा ईसाई सांप्रदायिकता, घृणा या हिंसा के शिकार हों। अनेक विश्लेषकों ने कहा भी है कि इसका अर्थ है कि यदि 2002 में यह कानून लागू होता तो जिन 59 हिंदुओं को गुजरात के गोधरा स्टेशन में साबरमती स्टेशन में जलाकर मार दिया गया उनकी हत्या के संदर्भ में एफआइआर दर्ज नहीं कराई जा सकती थी, क्योंकि इस कानून के तहत गुजरात में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन मुस्लिम गोधरा बाद के दंगों के लिए इस कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल कर सकते थे। इसका सीधा अर्थ है कि सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होने वाले हिंदुओं को दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में देखा जाएगा और यह काफी कुछ पाकिस्तान जैसे इस्लामिक राज्य में लागू हिंदू विरोधी कानूनों की तरह है। प्रस्तावित कानून के मसौदे के अनुसार एक पीडि़त की व्याख्या अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य के रूप में की गई है, जिसे सांप्रदायिक हिंसा की घटना में शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक क्षति पहुंची हो या उसकी संपत्ति को नुकसान हुआ हो। इसके दायरे में उसके संबंधी, कानूनी अभिभावक और उत्तराधिकारी भी शामिल हैं। इस व्याख्या के आधार पर देश के किसी हिस्से में कोई मुस्लिम या ईसाई का यदि किसी सामान्य मुद्दे पर अपने हिंदू पड़ोसी से विवाद होगा तो वह इस कानून का इस्तेमाल कर अपने पड़ोसी पर यह आरोप लगा सकता है कि उसने उसे मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचाया है। यदि वह किसी कारण ऐसा न करे तो उसके संबंधी ऐसा कर सकते हैं। इस पूरी कवायद का जो बुनियादी मकसद नजर आता है वह है हिंदुओं को निशाना बनाना। विधेयक कहता है कि इसे पूरे भारत में लागू किया जाएगा, लेकिन जब देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर की बात आती है तो इसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य की सहमति से इसे वहां लागू कर सकती है। यद्यपि इस विधेयक को इस तरह अंतिम रूप दिया गया है कि हिंदू समुदाय इसके विचित्र प्रावधानों की मार झेले, लेकिन मुस्लिम, ईसाई और सिखों को भी परेशानी झेलनी पड़ सकती है, क्योंकि बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के निर्धारण के लिए राज्य ही इकाई है। 2001 के जनगणना आंकड़ों के मुताबिक सिख पंजाब में 59.9 प्रतिशत हैं, जबकि हिंदुओं की आबादी 36.9 प्रतिशत है। यदि यह कानून लागू हो जाता है तो बहुसंख्यक सिख समाज को हिंदुओं की शिकायत पर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसी तरह ईसाई तीन राज्यों-नागालैंड (90 प्रतिशत), मिजोरम (87 प्रतिशत) और मेघालय (70.30 प्रतिशत) में बहुसंख्यक हैं। यदि इन राज्यों में हिंदुओं ने इस कानून का मनमाना इस्तेमाल शुरू कर दिया तो ईसाई समाज को मुसीबतें उठानी पड़ सकती हैं। लिहाजा मुस्लिम, ईसाई और सिख समुदाय को कांग्रेस पार्टी के इस दावे पर कदापि भरोसा नहीं करना चाहिए कि यह विधेयक पंथनिरपेक्षता को मजबूत करेगा, क्योंकि यह विधेयक सांप्रदायिक हिंसा और घृणा के सभी दोषियों को बराबरी पर नहीं देखता। प्रत्येक राज्य में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के निर्धारण में एक अन्य विसंगति भी है। मणिपुर में 46 प्रतिशत हिंदू हैं और अरुणाचल प्रदेश में 34.60 प्रतिशत। चूंकि इन राज्यों में किसी धार्मिक समूह के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है लिहाजा किसे पीडि़त माना जाएगा और किसे दोषी? इसके अतिरिक्त यदि अनुसूचित जाति और जनजाति को हिंदू समुदाय से अलग कर दिया जाए तो इन राज्यों में हिंदू आबादी का प्रतिशत क्या होगा? केरल का मामला भी है, जहां 56.20 प्रतिशत हिंदू हैं। अगर इससे 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति और जनजाति को अलग कर दिया जाए तो हिंदुओं का प्रतिशत क्या होगा? यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि जो कानून बनाया जा रहा है वह दरअसल सांप्रदायिक भी है और एक समुदाय यानी हिंदुओं को निशाना बनाने वाला भी। अगर इस विधेयक के सूत्रधार अपने मंसूबे में सफल रहे तो भारत की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाएगी। ऐसा विधेयक वह व्यक्ति नहीं बना सकता जो लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्ष भारत से प्यार करता है। हमें इसकी जांच करनी चाहिए कि विधेयक का मूल मसौदा कहां से आया है?
 
                          यह लेख दैनिक जागरण के सम्पादकीय से लिया गया है .
 
                                                                            अभिषेक सिंह
                                                                             गाजीपुर

Wednesday, June 29, 2011

कांग्रेस के मूल स्वभाव और चरित्र को समझे बिना वर्तमान राजनीति के पतन का विश्लेषण संभव नहीं।

कांग्रेस के मूल स्वभाव और चरित्र को समझे बिना वर्तमान राजनीति के पतन का विश्लेषण संभव नहीं। विडंबना यह है कि कांग्रेस के सत्ता केंद्रित अहंकारी स्वभाव का प्रसार भारत की राजनीति में घर कर चुका है। सत्ता के लिए किसी भी सीमा तक जाना तथा राजनीति में वोट लाभ के लिए अनुपयोगी जनकल्याण को छोड़ देना इसका स्वभाव बन गया है। सत्ता की आतुरता और संघर्ष से घबराहट के कारण ही कांग्रेस ने 1947 में पाकिस्तान का प्रस्ताव स्वीकार करके भारत का विभाजन कराया। पचास के दशक में चीन के हाथ तिब्बत खोया और 1.25 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि चीन तथा पाकिस्तान के कब्जे में जाने दी। लेडी एडविना माउंटबेटन के प्रभाव में नेहरू कश्मीर का मामला सरदार पटेल की सहमति के बिना राष्ट्रसंघ में ले गए जिस कारण धारा 370 का ऐसा संवैधानिक विधान लागू करवाया जो बाद में अलगाववाद तथा आतंकवाद के पोषण का सबसे बड़ा कारण बन गया। कांग्रेस की इसी सत्ताभोगी मानसिकता के कारण 1962 में चीन का हमला हुआ। 1965 में हम जीतकर भी हारे तो 1971 में इंदिरा गांधी को मिले अभूतपूर्व सर्वदलीय प्रशंसा और समर्थन के बावजूद शिमला समझौते में हम कश्मीर का मसला निर्णायक तौर पर हल नहीं कर सके। हालांकि उस समय पाकिस्तान की गर्दन हमारे हाथों में थी। इसी कारण उस समय वरिष्ठ कवि सोम ठाकुर ने लिखा था- इतिहास लिखा था खून से जो स्याही से काट दिया हमने। चुनावी लाभ के लिए दंगे, बेवजह पुलिसिया कार्रवाई, ब्ल्यू स्टार तथा 1984 के सिख विरोधी दंगों आदि से उसका सत्ताविलासी चरित्र और इतिहास साबित होता है। 1947 के बाद से आज तक सबसे ज्यादा हिंदू-मुस्लिम दंगे केवल कांग्रेस शासित राज्यों में हुए। संप्रग-1 व 2 के दौरान कांग्रेस ने सच्चर समिति से लेकर हज यात्रियों के लिए जरूरी पासपोर्ट तक में पुलिस जांच की जरूरत खत्म करके सामाजिक खाई पैदा करने का प्रयास किया है जिसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। आम जनता प्राय: इतिहास को जल्दी भुला देती है। कांग्रेस कितनी निर्मम और संवेदनहीन हो सकती है इसका सबसे भयानक उदाहरण यदि 1975 में लागू आपातकाल है तो ताजा उदाहरण सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा निषेध विधेयक है। यह विधेयक कांग्रेस के विकृत एवं हिंदू विरोधी अराष्ट्रीय चरित्र का सबसे निकृष्ट उदाहरण है। इस विधेयक द्वारा न केवल हिंदुओं को आक्रामक और अपराधी वर्ग में ला खड़ा करने, बल्कि हिंदू-मुस्लिमों के बीच शत्रुता पैदा कर हर गली-कस्बे में दंगे करवाने की साजिश है। यदि यह औरंगजेबी फरमान कानून की शक्ल लेता है तो किसी भी हिंदू पर कोई भी मुस्लिम नफरत फैलाने, हमला करने, साजिश करने अथवा नफरत फैलाने के लिए आर्थिक मदद देने या शत्रुता का भाव फैलाने के नाम पर मुकदमा दर्ज करवा सकेगा और उस बेचारे हिंदू को इस कानून के तहत कभी शिकायतकर्ता मुसलमान की पहचान तक का हक नहीं होगा। इसमें शिकायतकर्ता के नाम और पते की जानकारी उस व्यक्ति को नहीं दी जाएगी जिसके खिलाफ शिकायत दर्ज की जा रही है। इसके अलावा शिकायतकर्ता मुसलमान अपने घर बैठे शिकायत दर्ज करवा सकेगा। इसी प्रकार यौन शोषण व यौन अपराध के मामले भी केवल और केवल मुस्लिम (जिसे विधेयक में अल्पसंख्यक वर्ग के अंतर्गत समूह नाम से परिभाषित किया गया है) हिंदू के विरुद्ध दर्ज करवा सकेगा और ये सभी मामले अनुसूचित जाति और जनजाति पर किए जाने वाले अपराधों के साथ समानांतर चलाए जाएंगे। इसका मतलब है कि संबंधित हिंदू व्यक्ति को कभी यह नहीं बताया जाएगा कि उसके खिलाफ शिकायत किसने दर्ज कराई है? इसके अलावा उसे एक ही तथाकथित अपराध के लिए दो बार दो अलग-अलग कानूनों के तहत दंडित किया जाएगा। यही नहीं, यह विधेयक पुलिस और सैनिक अफसरों के विरुद्ध उसी तरह बर्ताव करता है जिस तरह से कश्मीरी आतंकवादी और आइएसआइ उनके खिलाफ रुख अपनाते हैं। विधेयक में समूह यानी मुस्लिम के विरुद्ध किसी भी हमले या दंगे के समय यदि पुलिस, अ‌र्द्धसैनिक बल अथवा सेना तुरंत और प्रभावी ढंग से स्थिति पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करती तो उस बल के नियंत्रणकर्ता अथवा प्रमुख के विरुद्ध आपराधिक धाराओं में मुकदमे चलाए जाएंगे। कुल मिलाकर हर स्थिति में पुलिस या अ‌र्द्धसैनिक बल के अफसरों को कठघरे में खड़ा होना होगा, क्योंकि स्थिति पर नियंत्रण जैसी परिस्थिति किसी भी ढंग से परिभाषित की जा सकती है। इस विधेयक की धाराएं किसी भी सभ्य, समान अधिकार संपन्न एवं भेदभावरहित गणतंत्र के लिए ईदी अमीन और सऊदी अरब के शाहों की तरह ही अन्य आस्थाओं के लोगों के प्रति नफरत एवं आक्रामकता का दर्शन कराती हैं। प्रसिद्ध न्यायविद जेएस वर्मा और न्यायमूर्ति बीएल श्रीकृष्ण ने भी इस विधेयक को एकतरफा झुकाव वाला, केंद्र एवं राज्यों में अफसरशाही निर्मित करने वाला और केंद्र-राज्य संबंधों में नकारात्मक असर डालने वाला बताया है। जरा देखिए, इस विधेयक को बनाने वालों ने सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए जिस सात सदस्यीय समिति के गठन की सिफारिश की है, उसमें चार सदस्य मजहबी अल्पसंख्यक होंगे। विधेयक मानकर चलता है कि यदि समिति में अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों का बहुमत नहीं होगा तो समिति न्याय नहीं कर सकेगी। अपेक्षा है कि ये सात सदस्य किसी भी सांप्रदायिक हिंसा को रोकेंगे, जांच पर नजर रखेंगे, आपराधिक मुकदमों, पेशियों, राहत कार्यो तथा पुनर्वास को अपनी देखरेख में चलाएंगे। आखिर ये सात सदस्य होंगे या फरिश्ते अथवा फिर आपातकाल के दारोगा?
                                                                                                 Abhishek Singh
                                                                                                    Ghazipur

Friday, April 15, 2011

पत्र जो हमारे दिल के करीब होते थे

  नमस्कार पाठकों 

          मुझे पत्र लिखने का तो कम ही मौका मिला है परन्तु पत्र पढने का कई बार मिला है. जिसे हम गावों में चिट्ठी के नाम से जानते थे, वो चिट्ठी का इंतजार वो चिट्टी के साथ आत्मीय लगाव और चिट्ठी में लिखी और पूछी गयी सारी बातें जिस में घर के साथ साथ गाय, भैस खेती बाड़ी  और पुरे गाँव संग संग रिश्तेदारी की भी ख़बरें ऐसा लगता था जैसे पत्र लिखने वाला सामने ही खड़ा हो और हाल पूछ रहा हो. चिट्ठी की पहली लाइन ही ऐसे शुरू  होती थी जैसे मिठाश की बौछार और इस बौछार में पूरे परिवार को भिगाने की की गयी वो शानदार कोशिश, छोटों को आशीर्वाद और बड़ों को प्यार ऐसे शब्द जैसे दिल को छू जाते थे. पोस्टमैन चाचा को देखते ही मन में बरबस ही ख्याल आ जाता की हो सकता है मेरे भी घर की चिट्ठी हो और पूछ बैठते चाचा चिट्ठी है क्या ? अगर होती तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता. फिर शुरू होता चिट्ठी पढने का शिलशिला और वो अनवरत कई दिनों तक चलता रहता . मेरे घर पे कभी मेरे ननिहाल से नानी.नाना की चिट्ठी आती  तो कभी मेरी बुआ जी की, घर में मेरी माता जी अकेले हुआ करती थी और ऊपर से दिन भर का काम इसी काम  की भीड़ में कभी-कभी पत्रों का जवाब नहीं दे पाती थी. मैं  उस समय कक्षा ७-८ का स्टुडेंट था जब पहली बार माता जी ने मुझसे कहा की बुवा जी के पत्रों का जवाब लिख दो मैं पहली बार चिट्ठी लिखने जा रहा था मन में हर्ष के साथ-साथ ये भी लग रहा था की कही कुछ गलत न हो जाये, माताजी ने थोडा सा बता दिया और बुआ जी का आया हुआ पत्र भी मुझे पकड़ा दिया मैंने पत्र में पूछी गयी बातो का जवाब लिखते गया पहले तो  मन में बड़े ख्याल थे ये लिखूंगा, वो लिखूंगा जब लिखने गए  तो सारे के सारे भूल गए वैसे   मैंने पत्र पूरा किया और बुआ जी के अगले पत्र का इंतजार करने लगा और मेरी उम्मीद के मुताबिक मेरी तारीफ भी लिखी थी पत्र में, बड़ा हर्ष हुआ लेकिन इसके साथ ही चिट्ठी लिखने की ज़िम्मेदारी भी मेरे ऊपर ही आ गई क्या करता लिखना ही था .  

          पहले हमारे जीवन में सन्देश आदान प्रदान का एक सशक्त माध्यम हुआ करता था पत्र, पत्रों में जो आत्मीयता रहती  थी, जो इंतजार रहता था, जो प्यार रहता था वो आज हमारे पास नहीं है . माना की आज हमारे पास इस तकनीकी युग में सन्देश आदान प्रदान के अनेको माध्यम है परन्तु  पत्रों वाली बात जिन्हें छिट्ठी कहते थे वो अब कहाँ ? अब तो कही भी अन्तेर्देशी पत्र नहीं दिखतें  है बस उनकी यादें ही हमारे जीवन में रह गयी है. आज के इस मोबाइल और कंप्यूटर इ-मेल के युग में कहा रहेगा चिट्ठी का अश्तित्व लेकिन पत्रों के  इंतजार में जो आनंद हुआ करता था अब कहाँ है? जो बातें हम पत्रों के माध्यम से कह सकते थे वो हम बोल कर नहीं कह सकते है क्यों  की पत्र  शांत मन से लिखा जाता था और कोशिश यही की जाती थी की इसमें कुछ ऐसा न लिख जाये जिस से पढने वाला दुखी हो जाये ..


                                                                             अभिषेक सिंह
                                                                               गाजीपुर
  

Thursday, April 7, 2011

आज़ादी जी जंग है हजारे का प्रयाश हम साथ है पूरा देश साथ है

आप सभी पाठकों को मेरा नमस्कार

        आज बहुत दिन बाद कुछ लिखने का मन हुआ है सोच रहा था  क्या लिखू?  तभी मन में आया अन्ना हजारे के किये जा रहे सराहनीय प्रयाश का लोकपाल बिधेयक की मांग और भ्रष्टाचार पर उठाई जा रही उनकी आवाज़ जिससे सरकार की किरकिरी  हो रही है और सरकार भी खूब है हमारे बेईमान नेतावों के ईमानदार सरदार जी ने कहा की अन्ना को किसी ने बहका दिया है जिससे वो अनशन पर बैठें है.लेकिन सरकार को ये पता होना चाहिए की अन्ना कोई बच्चे नहीं है जो वो किसी के बहकावे में आजायेंगे और अनशन कर देंगे. अन्ना को मिल रहे समर्थन से भी तो सरकार को ये पता होना चाहिए की अब देश सरकार का नहीं जनता का है जनता भी अब समझ गयी है की देश में क्या हो रहा है अब एक नहीं हज़ार अन्ना पैदा होंगे ये अभियान एक क्रांति का रूप लेगा और भारत की तश्वीर बदल देगा क्यों की अब इसी की जरुरत है बिना इस के कुछ भी नहीं हो सकता है इस देश का क्यों की देश के मुखिया को देश में क्या हो रहा है इसका पता होते हुए भी नहीं पता है. बेईमानों की फौज खड़ी कर  रखी है सरकार ने महंगाई बढती जा रही है जनता त्रस्त है सरकार मस्त है.महंगाई को सरकार देश के विकास  के लिए जरुरी मानती है लकिन कैसा विकास  जब देश की जनता भूख से बिलख रही है जनता के पैसे से नौकरशाह ऐश कर रहे है, और आज जब अन्ना जैसा कोई समाज सेवी जनता की आवाज़ उठा रहा है तो सरकार कहती है की उन्हें बहकाया गया है नहीं ऐसा नहीं है. अन्ना ने तो किसी से नहीं कहा की आप मेरे साथ आवो बल्कि जनता को यह खुद लगने लगा है तो जनता उनके अभियान के साथ है और इसतरह के किसी भी अभियान में जनता साथ रहेगी. आज़ादी की जंग जैसी है यह लड़ाई और हम सब है क्रन्तिकारी जो देश को इस गुलामी से आजाद करने का संकल्प लेते है क्यों की बिना जनता के सहयोग के ऐसा कोई भी अभियान सफल नहीं हो सकता और इस अभियान का सफल होना जरुरी है अन्ना हजारे जैसा बुज़ुर्ग फौजी जब देश के लिए इतना कुछ कर सकते है तो हम युवा क्यों नहीं?हमें अपने आसपास समाज में होने वाले भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी,रिश्वत के खिलाफ मिलकर आवाज़ उठानी चाहिए और सिर्फ आवज़ ही नहीं उठानी चाहिए बल्कि इसे रोकने का प्रयाश भी करना चाहिए.

                                                                                 अभिषेक सिंह
                                                                                   गाजीपुर

Thursday, March 17, 2011

आप सभी लोगो को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं

आप सभी लोगो को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं


                 जी हाँ मित्रों मेरी तरफ से आप सभी को होली मुबारक हो, होली एक ऐसा पर्व है जिस से हमें लोगों से मिलने मिलाने का मौका मिलता है, होली रंगो का त्यौहार है और इन रंगों से हमें बहुत कुछ  सीखने  को मिलता है जिस तरह कई रंग मिल कर एक नए रंग का रूप ले लेते है. उसी   तरह हमें भी अपने जीवन में लोगो से हिल मिल कर रहना चाहिए न की बैर दुश्मनी से.  ये रंग की छोटी सी पुडिया हमें रंगीन कर जाती है हमें इतनी बड़ी सीख  दे जाती है और हम है की इन्सान हो कर भी अपना प्रभाव लोगो पर नहीं  छोड़  पाते है.  हमें भी कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे हमारे समाज में खुशहाली हो, अमन हो, न की कलह हो. होली हमें साफ  सुथरा रहने की सीख  देती है.  क्या सिर्फ तन या कपडे साफ कर लेने से ही सब कुछ साफ हो जाता है ? नहीं . ऐसा नहीं है हमें तन और कपड़ो के साथ अपने व्यक्तित्व को  भी साफ रखना होगा  ..

              आज कल तो होली का मतलब ही बदल गया है या यूँ  कह लिया जाये की बदल दिया गया है होली पवित्रता और उल्लास, विजय का पर्व होता है लेकिन आज तो होली के दिन मदिरा पान करना आम चलन हो गया है. और दिनों से ज्यादा लोग इस दिन शराब  पीते है शराब  की दुकानों पर भीड़ जुटी होती है पीने वालों की, और फिर होता क्या है दारू के नशे  में लोगो से झगड़ा करते है. कहा तक सही है ये सब क्या इस पबित्र पर्व पर नशा  जरुरी है या ये सिर्फ पीने वालों की शरारत  होती है..
 
     हमें इस वर्ष होली पर यह संकल्प लेना चाहिए की हमें समाज से इन बुराइयों को मिटाना है एक सुन्दर और स्वच्छ समाज बनाना है न की नसे का समाज .

           एक बार फिर आप सभी लोगों को होली की शुभकामनायें .

                                                                  अभिषेक सिंह
                                                                    गाजीपुर