Tuesday, August 23, 2011
Saturday, August 20, 2011
भ्रस्टाचार क्या है ?
आखिर क्या है भ्रस्टाचार, क्यों हो रहा है ये हो हल्ला, क्या हम जारी रख पाएंगे अन्ना जी के द्वारा श्हुर किये गए इस आन्दोलन को, या कुछ दिनों बाद हम फिर से भूल जायेंगे इस आन्दोलन को ? ये सारे सवाल है जो हमारे जेहन में कौध रहे है क्या करें हम भारत वासी जो है, हमें गर्व है भारत वासी होने का लेकिन क्या करें भ्रस्टाचार तो यहाँ के लोगों के जेहन में है सरकार भ्रष्ट, सरकारी मुलाजिम भ्रष्ट और तो और जनता भी भ्रष्ट. क्या लगता है सिर्फ कुछ दिन तक सडको पर उतर कर सरकार के खिलाफ नारेबाजी करके हम भ्रस्टाचार मिटा सकते है. नहीं.. सिर्फ यही करने से हमारे देश से भ्रस्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता इसे जड़ से खत्म करने का सबसे अचूक तरीका है जैसे हम आज जागरूक हुए है वैसे हमें हमेसा जागरूक होना पड़ेगा, अपने हक़ के लिए लड़ना पड़ेगा, इस देश के हर नागरिक का क्या अधिकार है ये जानना होगा, जो क्रांति अन्ना जी ने शुरू की है उसे सदा आगे बढ़ाना होगा, अगर ७४ साल की उम्र में अन्ना जी सरकार को घुटनों के बल ला सकते है तो इस देश का हर नागरिक अगर आगे आये तो क्या कुछ नहीं हो सकता है.
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
Tuesday, August 9, 2011
कहानी गरीबी की
कोई न कोई घटना ,दुर्घटना रा यूँ कह लीजिये संजोग तो सब के साथ होता रहता है, दुनिया का ऐसा कौन सा इन्सान होगा जिसके जीवन में कोई ऐसी बात न हुई हो जिसने उसके मन पर कुछ असर न डाला हो, न भी डाला हो तो मै औरों की बात कैसे कर सकता हु लेकिन मेरे मन पर तो ऐसी एक घटना ने गहरा प्रभाव छोड़ा है और वो घटना मुझे कभी भूलती नहीं है.
मैंने बड़े करीब से देखा है गरीबी को क्यों की मै एक छोटे से ग्रामीण परिवार का रहने वाला हु और गावों में आज भी गरीबी का मंजर देखने को मिलजाता है, मैंने उस गरीबी को देखा है जब जड़े के सर्द मौसम में भी गरीब परिवार के बच्चों के पास तन ढके के लिए गर्म कपडे नहीं होते थे और खाने के लिए भोजन भी नहीं होता था , आज कल तो बड़े बड़े दावे किये जा रहे है कि भारत समृद्ध हो रहा है यहाँ गरीबी कम हो रही है, कहाँ कम हो रही है गरीबी और कहा भारत समृद्ध हो रहा है, क्या देश के गिने चुने लोगों के आमीर हो जाने से देश में गरीबी ख़त्म हो जाएगी या देश का विकास हो जायेगा ? कभी नहीं. गरीबी तो आज भी है हमारे देश में और आज भी बहुत सारे लोग है जिन्हें खाना भी नसीब नहीं होता है , आज भी बच्चे स्कूल जाने कि उम्र में अपना बचपना भुला कर ढाबों पर, होटलों में, कारखानों पर और अमीरों के घरों में, नालियों में कुडों के ढेर पर से प्लास्तिच्क इकठ्ठा करते दिख जाते है और हम कहते है कि गरीबी कम हो रही है
मै आप को अपने जीवन कि एक घटना सुनाता हूँ , मै उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के छोटे से गाँव कटघरा का रहने वाला हु , आज मेरी उम्र लगभग २५ वर्ष है और मुझे याद है जब मेरी उम्र लगभग १३-१४ वर्ष कि रही होगी . मैं अपने गाँव में कुछो दोस्तों के साथ खेल रहा था कभी मैंने देखा कि मेरे गाँव में एक बीमार और बूढी औरत जो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी लोगों के घरों के पास जा कर कुछ खाने को मांगने लगी, देखने में वह औरत इतनी कुरूप और गन्दी लग रही थी कि लोग उसे कुछ देने कि बजाय अपने घर से भगाने लगे मुझे यह देख बड़ा आश्चर्य हुआ कि दुनिया में कितने निर्दयी लोग भी होते है एक तो लोग उसे कुछ दे नहीं रहे थे और ऊपर से झिडकियां भी सुना रहे थे. मुझे उस दिन पता चला कि गरीबी इन्सान से क्या कुछ नहीं करा देती है . फ्री भी वह बूढी लचर औरत हर दरवाजे गयी लेकिन हर जगह उसे वही झिडकियां ही मिली . यह देख मेरा मन दादा द्रवित हुआ और मै वहां से दौड़े दौड़े अपने घर आया अपनी माता जी से साडी बात बताई, मेरी माता जी ने कहा बेटे उसे यहाँ बुला लाओ वैसे मुझे पता था कि घर में खाना समाप्त हो चूका था क्यों कि दोपहर बाद का समय था और घर के सारे सदस्य खाना खा चुके थे, फिर भी मैं दौड़ते हुआ वापस गया लेकिन तब तक वो औरत वहा से कहीं जा चुकी थी मैंने आस पास लोगों से पूछा तो किसी ने कुछ बताया नहीं मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ कि मैंने उस लचर औरत कि कोई मदद नहीं कि मैंने फिर भी उसे ढूढना सुरु किया, लगभग २०-२५ मिनट कि तलाश के बाद वो और मुझे गाँव के ही एक जगह मिल गयी मैंने उससे कहा " आजी हमरे घरे चला तोहके हमार मम्मी बोलावलस ह " ये बात सुन कर वो औरत जिसे देख कर ही लग जा रहा था कि उसे कई दिन से भूखी है बड़ी खुश हुई और मेरे साथ मेरे घर आयी, मेरी माता जी ने उसके लिए शरबत बनाया और उसे भुजा जिसे गाँव में "दाना" भी कहता है खाने को दिया और उसे तन ढकने के लिए एक साड़ी भी दी और बदले में उस औरत बूढी औरत ने हमें दुनिया कि अमूल्य चीज जिसे हम आशीर्वाद कहते है दिया जिसके लिए हम मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे जाते हैं वो हमें देदी स्वरुप बूढी दादी से वही मिल गया. इस कम से मुझे जो आत्मीय संतोष मिला वो मै बयां नहीं कर पा रहा हूँ. अपनी सारी बात उस औरत ने कह सुनाई और बताया कि एक मुसहर जाती कि है, गरीबी ने उसे इस कदर परेसान कर रखा था कि उसे पेट भरने के लिए रोटी और तन ढकने के लिए कपडा भी नहीं था, वह औरत लालची नहीं बल्कि स्वाभिमानी थी उसने अपने से कभी खाने के सिवाय और कुछ नहीं माँगा, सालों तक को महीने में एक बार मेरे घर जरू आती और वो अमूल्य आशीर्वाद हमें दे जाती, हमारे परिवार को भी जैसे उसके आशीर्वाद कि आदत सी हो गयी थी. कुछ सालों बाद उस बूढी दादी का आना बंद हो गया और मै भी तब तक घर से बहार पढाई के लिए चला गया एक बार मुझे उसकी याद आयी मैंने माता जी से पूछ तो पता चला कि वो तो अब इस दुनिया में नहीं रही सुन कर बड़ा दुःख हुआ पर मन को संतोष भी था कि चलो मैंने कभी उनकी मदद तो कि. वैसे मुझे लगता है कि उनका आशीर्वाद आज भी हमारे साथ है और हमारे उन्नति में सहायक है .
अभिषेक सिंह
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