Friday, April 15, 2011

पत्र जो हमारे दिल के करीब होते थे

  नमस्कार पाठकों 

          मुझे पत्र लिखने का तो कम ही मौका मिला है परन्तु पत्र पढने का कई बार मिला है. जिसे हम गावों में चिट्ठी के नाम से जानते थे, वो चिट्ठी का इंतजार वो चिट्टी के साथ आत्मीय लगाव और चिट्ठी में लिखी और पूछी गयी सारी बातें जिस में घर के साथ साथ गाय, भैस खेती बाड़ी  और पुरे गाँव संग संग रिश्तेदारी की भी ख़बरें ऐसा लगता था जैसे पत्र लिखने वाला सामने ही खड़ा हो और हाल पूछ रहा हो. चिट्ठी की पहली लाइन ही ऐसे शुरू  होती थी जैसे मिठाश की बौछार और इस बौछार में पूरे परिवार को भिगाने की की गयी वो शानदार कोशिश, छोटों को आशीर्वाद और बड़ों को प्यार ऐसे शब्द जैसे दिल को छू जाते थे. पोस्टमैन चाचा को देखते ही मन में बरबस ही ख्याल आ जाता की हो सकता है मेरे भी घर की चिट्ठी हो और पूछ बैठते चाचा चिट्ठी है क्या ? अगर होती तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता. फिर शुरू होता चिट्ठी पढने का शिलशिला और वो अनवरत कई दिनों तक चलता रहता . मेरे घर पे कभी मेरे ननिहाल से नानी.नाना की चिट्ठी आती  तो कभी मेरी बुआ जी की, घर में मेरी माता जी अकेले हुआ करती थी और ऊपर से दिन भर का काम इसी काम  की भीड़ में कभी-कभी पत्रों का जवाब नहीं दे पाती थी. मैं  उस समय कक्षा ७-८ का स्टुडेंट था जब पहली बार माता जी ने मुझसे कहा की बुवा जी के पत्रों का जवाब लिख दो मैं पहली बार चिट्ठी लिखने जा रहा था मन में हर्ष के साथ-साथ ये भी लग रहा था की कही कुछ गलत न हो जाये, माताजी ने थोडा सा बता दिया और बुआ जी का आया हुआ पत्र भी मुझे पकड़ा दिया मैंने पत्र में पूछी गयी बातो का जवाब लिखते गया पहले तो  मन में बड़े ख्याल थे ये लिखूंगा, वो लिखूंगा जब लिखने गए  तो सारे के सारे भूल गए वैसे   मैंने पत्र पूरा किया और बुआ जी के अगले पत्र का इंतजार करने लगा और मेरी उम्मीद के मुताबिक मेरी तारीफ भी लिखी थी पत्र में, बड़ा हर्ष हुआ लेकिन इसके साथ ही चिट्ठी लिखने की ज़िम्मेदारी भी मेरे ऊपर ही आ गई क्या करता लिखना ही था .  

          पहले हमारे जीवन में सन्देश आदान प्रदान का एक सशक्त माध्यम हुआ करता था पत्र, पत्रों में जो आत्मीयता रहती  थी, जो इंतजार रहता था, जो प्यार रहता था वो आज हमारे पास नहीं है . माना की आज हमारे पास इस तकनीकी युग में सन्देश आदान प्रदान के अनेको माध्यम है परन्तु  पत्रों वाली बात जिन्हें छिट्ठी कहते थे वो अब कहाँ ? अब तो कही भी अन्तेर्देशी पत्र नहीं दिखतें  है बस उनकी यादें ही हमारे जीवन में रह गयी है. आज के इस मोबाइल और कंप्यूटर इ-मेल के युग में कहा रहेगा चिट्ठी का अश्तित्व लेकिन पत्रों के  इंतजार में जो आनंद हुआ करता था अब कहाँ है? जो बातें हम पत्रों के माध्यम से कह सकते थे वो हम बोल कर नहीं कह सकते है क्यों  की पत्र  शांत मन से लिखा जाता था और कोशिश यही की जाती थी की इसमें कुछ ऐसा न लिख जाये जिस से पढने वाला दुखी हो जाये ..


                                                                             अभिषेक सिंह
                                                                               गाजीपुर
  

Thursday, April 7, 2011

आज़ादी जी जंग है हजारे का प्रयाश हम साथ है पूरा देश साथ है

आप सभी पाठकों को मेरा नमस्कार

        आज बहुत दिन बाद कुछ लिखने का मन हुआ है सोच रहा था  क्या लिखू?  तभी मन में आया अन्ना हजारे के किये जा रहे सराहनीय प्रयाश का लोकपाल बिधेयक की मांग और भ्रष्टाचार पर उठाई जा रही उनकी आवाज़ जिससे सरकार की किरकिरी  हो रही है और सरकार भी खूब है हमारे बेईमान नेतावों के ईमानदार सरदार जी ने कहा की अन्ना को किसी ने बहका दिया है जिससे वो अनशन पर बैठें है.लेकिन सरकार को ये पता होना चाहिए की अन्ना कोई बच्चे नहीं है जो वो किसी के बहकावे में आजायेंगे और अनशन कर देंगे. अन्ना को मिल रहे समर्थन से भी तो सरकार को ये पता होना चाहिए की अब देश सरकार का नहीं जनता का है जनता भी अब समझ गयी है की देश में क्या हो रहा है अब एक नहीं हज़ार अन्ना पैदा होंगे ये अभियान एक क्रांति का रूप लेगा और भारत की तश्वीर बदल देगा क्यों की अब इसी की जरुरत है बिना इस के कुछ भी नहीं हो सकता है इस देश का क्यों की देश के मुखिया को देश में क्या हो रहा है इसका पता होते हुए भी नहीं पता है. बेईमानों की फौज खड़ी कर  रखी है सरकार ने महंगाई बढती जा रही है जनता त्रस्त है सरकार मस्त है.महंगाई को सरकार देश के विकास  के लिए जरुरी मानती है लकिन कैसा विकास  जब देश की जनता भूख से बिलख रही है जनता के पैसे से नौकरशाह ऐश कर रहे है, और आज जब अन्ना जैसा कोई समाज सेवी जनता की आवाज़ उठा रहा है तो सरकार कहती है की उन्हें बहकाया गया है नहीं ऐसा नहीं है. अन्ना ने तो किसी से नहीं कहा की आप मेरे साथ आवो बल्कि जनता को यह खुद लगने लगा है तो जनता उनके अभियान के साथ है और इसतरह के किसी भी अभियान में जनता साथ रहेगी. आज़ादी की जंग जैसी है यह लड़ाई और हम सब है क्रन्तिकारी जो देश को इस गुलामी से आजाद करने का संकल्प लेते है क्यों की बिना जनता के सहयोग के ऐसा कोई भी अभियान सफल नहीं हो सकता और इस अभियान का सफल होना जरुरी है अन्ना हजारे जैसा बुज़ुर्ग फौजी जब देश के लिए इतना कुछ कर सकते है तो हम युवा क्यों नहीं?हमें अपने आसपास समाज में होने वाले भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी,रिश्वत के खिलाफ मिलकर आवाज़ उठानी चाहिए और सिर्फ आवज़ ही नहीं उठानी चाहिए बल्कि इसे रोकने का प्रयाश भी करना चाहिए.

                                                                                 अभिषेक सिंह
                                                                                   गाजीपुर