नमस्कार पाठकों
मुझे पत्र लिखने का तो कम ही मौका मिला है परन्तु पत्र पढने का कई बार मिला है. जिसे हम गावों में चिट्ठी के नाम से जानते थे, वो चिट्ठी का इंतजार वो चिट्टी के साथ आत्मीय लगाव और चिट्ठी में लिखी और पूछी गयी सारी बातें जिस में घर के साथ साथ गाय, भैस खेती बाड़ी और पुरे गाँव संग संग रिश्तेदारी की भी ख़बरें ऐसा लगता था जैसे पत्र लिखने वाला सामने ही खड़ा हो और हाल पूछ रहा हो. चिट्ठी की पहली लाइन ही ऐसे शुरू होती थी जैसे मिठाश की बौछार और इस बौछार में पूरे परिवार को भिगाने की की गयी वो शानदार कोशिश, छोटों को आशीर्वाद और बड़ों को प्यार ऐसे शब्द जैसे दिल को छू जाते थे. पोस्टमैन चाचा को देखते ही मन में बरबस ही ख्याल आ जाता की हो सकता है मेरे भी घर की चिट्ठी हो और पूछ बैठते चाचा चिट्ठी है क्या ? अगर होती तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता. फिर शुरू होता चिट्ठी पढने का शिलशिला और वो अनवरत कई दिनों तक चलता रहता . मेरे घर पे कभी मेरे ननिहाल से नानी.नाना की चिट्ठी आती तो कभी मेरी बुआ जी की, घर में मेरी माता जी अकेले हुआ करती थी और ऊपर से दिन भर का काम इसी काम की भीड़ में कभी-कभी पत्रों का जवाब नहीं दे पाती थी. मैं उस समय कक्षा ७-८ का स्टुडेंट था जब पहली बार माता जी ने मुझसे कहा की बुवा जी के पत्रों का जवाब लिख दो मैं पहली बार चिट्ठी लिखने जा रहा था मन में हर्ष के साथ-साथ ये भी लग रहा था की कही कुछ गलत न हो जाये, माताजी ने थोडा सा बता दिया और बुआ जी का आया हुआ पत्र भी मुझे पकड़ा दिया मैंने पत्र में पूछी गयी बातो का जवाब लिखते गया पहले तो मन में बड़े ख्याल थे ये लिखूंगा, वो लिखूंगा जब लिखने गए तो सारे के सारे भूल गए वैसे मैंने पत्र पूरा किया और बुआ जी के अगले पत्र का इंतजार करने लगा और मेरी उम्मीद के मुताबिक मेरी तारीफ भी लिखी थी पत्र में, बड़ा हर्ष हुआ लेकिन इसके साथ ही चिट्ठी लिखने की ज़िम्मेदारी भी मेरे ऊपर ही आ गई क्या करता लिखना ही था .
पहले हमारे जीवन में सन्देश आदान प्रदान का एक सशक्त माध्यम हुआ करता था पत्र, पत्रों में जो आत्मीयता रहती थी, जो इंतजार रहता था, जो प्यार रहता था वो आज हमारे पास नहीं है . माना की आज हमारे पास इस तकनीकी युग में सन्देश आदान प्रदान के अनेको माध्यम है परन्तु पत्रों वाली बात जिन्हें छिट्ठी कहते थे वो अब कहाँ ? अब तो कही भी अन्तेर्देशी पत्र नहीं दिखतें है बस उनकी यादें ही हमारे जीवन में रह गयी है. आज के इस मोबाइल और कंप्यूटर इ-मेल के युग में कहा रहेगा चिट्ठी का अश्तित्व लेकिन पत्रों के इंतजार में जो आनंद हुआ करता था अब कहाँ है? जो बातें हम पत्रों के माध्यम से कह सकते थे वो हम बोल कर नहीं कह सकते है क्यों की पत्र शांत मन से लिखा जाता था और कोशिश यही की जाती थी की इसमें कुछ ऐसा न लिख जाये जिस से पढने वाला दुखी हो जाये ..
अभिषेक सिंह
गाजीपुर
